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ट्रेन में चिकन-मीट खाने वालों को लिए खुशखबरी, हलाल या झटका का झंझट होगा खत्म

January 12, 2026

नई दिल्ली: ट्रेन (Train) में मांसाहार खाने (Eating Meat) से यात्री (Passenger) बचते हैं. धार्मिक भावनाओं (Religious Sentiments) की वजह से लोग ट्रेन में चिकन या मांसाहार खाने से बचते हैं. दरअसल, हलाल और झटका के बीच मामला फंस जाता है. हिंदू यात्री हलाल चिकन खाने से बचते हैं, तो मुसलमान झटका. वैसे ट्रेन में मिलने वाले मांसाहार भोजन पर इसका वर्गीकरण नहीं होता है. मगर, अब इसका टेंशन खत्म होने जा रहा है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियंक कानूनगो (Priyank Kanungo) ने रेलवे (Railway) में कैटरर्स को हैंडल करने वाले एजेंसी आईआरसीटीसी को नोटिस जारी किया है.

दरअसल, रेलवे में खाने-पीने की चीजों, विशेषकर मांस के कैटेगरार्इज करने को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. अब एनएचआरसी ने रेलवे (IRCTC), भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और पर्यटन मंत्रालय को नोटिस जारी किया है. आयोग ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए कि उन्हें परोसा जाने वाला मांस ‘हलाल’ है या ‘झटका’?

प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह कार्रवाई उन शिकायतों के बाद की है, जिनमें कहा गया था कि भोजन परोसने वाली संस्थाएं मांस के प्रकार को सार्वजनिक नहीं कर रही हैं. आयोग ने अब इन सभी विभागों से 4 हफ्ते के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है.


  • NHRC के कड़े निर्देश:

    1. IRCTC के लिए आदेश: रेलवे अपने सभी भोजन बेचने वाले ठेकेदारों से स्पष्ट रूप से पूछकर यह जानकारी सार्वजनिक करे कि कौन ‘हलाल’ मांस बेचता है और कौन ‘झटका’. यह जानकारी यात्रियों के लिए आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए.
    2. FSSAI को निर्देश: खाद्य नियामक संस्था FSSAI को निर्देश दिया गया है कि वह सिख धर्म की धार्मिक भावनाओं के अनुरूप लेबलिंग की संभावनाओं को तलाशे, ताकि उपभोक्ता को पता चले कि उसे क्या परोसा जा रहा है.
    3. पर्यटन मंत्रालय और होटलों की रैंकिंग: होटलों की स्टार रैंकिंग प्रणाली में अब ‘हलाल’ या ‘झटका’ मांस के वर्गीकरण को शामिल करने पर विचार किया जाएगा.
    4. जीविका का अधिकार: आयोग का मानना है कि इस स्पष्टता से हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम मांस विक्रेताओं के जीविका के अधिकार को भी सुरक्षित किया जा सकेगा, जो अक्सर ‘हलाल’ की अनिवार्य लेबलिंग के कारण बाजार से बाहर हो जाते हैं.

    इस आदेश के पीछे दो धर्मों का हवाला दिया गया है- पहला सिख और मुस्लिम. सिखों की पवित्र नियम पुस्तिका ‘रहित मर्यादा’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि सिखों को हलाल पद्धति से तैयार किया गया मांस खाना वर्जित है. ऐसे में बिना लेबलिंग के उन्हें भोजन परोसना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है. दारुल उलूम देवबंद: देवबंद के अनुसार, हलाल पद्धति से स्लॉटर केवल मुस्लिम ही कर सकते हैं. आयोग का तर्क है कि यदि केवल ‘हलाल’ को ही मान्यता दी जाती है, तो यह गैर-मुस्लिम विक्रेताओं के व्यापार करने के अधिकार को प्रभावित करता है.

    प्रियंक कानूनगो ने नोटिस जारी करने का बाद कहा कि ‘हमें लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि उपभोक्ताओं के पास चुनाव का अधिकार नहीं है. पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है ताकि किसी की धार्मिक भावनाएं आहत न हों और सभी के लिए व्यापार के समान अवसर रहें.’

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