
नई दिल्ली: ट्रेन (Train) में मांसाहार खाने (Eating Meat) से यात्री (Passenger) बचते हैं. धार्मिक भावनाओं (Religious Sentiments) की वजह से लोग ट्रेन में चिकन या मांसाहार खाने से बचते हैं. दरअसल, हलाल और झटका के बीच मामला फंस जाता है. हिंदू यात्री हलाल चिकन खाने से बचते हैं, तो मुसलमान झटका. वैसे ट्रेन में मिलने वाले मांसाहार भोजन पर इसका वर्गीकरण नहीं होता है. मगर, अब इसका टेंशन खत्म होने जा रहा है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियंक कानूनगो (Priyank Kanungo) ने रेलवे (Railway) में कैटरर्स को हैंडल करने वाले एजेंसी आईआरसीटीसी को नोटिस जारी किया है.
दरअसल, रेलवे में खाने-पीने की चीजों, विशेषकर मांस के कैटेगरार्इज करने को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. अब एनएचआरसी ने रेलवे (IRCTC), भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और पर्यटन मंत्रालय को नोटिस जारी किया है. आयोग ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए कि उन्हें परोसा जाने वाला मांस ‘हलाल’ है या ‘झटका’?
प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह कार्रवाई उन शिकायतों के बाद की है, जिनमें कहा गया था कि भोजन परोसने वाली संस्थाएं मांस के प्रकार को सार्वजनिक नहीं कर रही हैं. आयोग ने अब इन सभी विभागों से 4 हफ्ते के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है.
NHRC के कड़े निर्देश:
इस आदेश के पीछे दो धर्मों का हवाला दिया गया है- पहला सिख और मुस्लिम. सिखों की पवित्र नियम पुस्तिका ‘रहित मर्यादा’ में स्पष्ट रूप से लिखा है कि सिखों को हलाल पद्धति से तैयार किया गया मांस खाना वर्जित है. ऐसे में बिना लेबलिंग के उन्हें भोजन परोसना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है. दारुल उलूम देवबंद: देवबंद के अनुसार, हलाल पद्धति से स्लॉटर केवल मुस्लिम ही कर सकते हैं. आयोग का तर्क है कि यदि केवल ‘हलाल’ को ही मान्यता दी जाती है, तो यह गैर-मुस्लिम विक्रेताओं के व्यापार करने के अधिकार को प्रभावित करता है.
प्रियंक कानूनगो ने नोटिस जारी करने का बाद कहा कि ‘हमें लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि उपभोक्ताओं के पास चुनाव का अधिकार नहीं है. पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है ताकि किसी की धार्मिक भावनाएं आहत न हों और सभी के लिए व्यापार के समान अवसर रहें.’
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