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सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा सवाल, कहा- क्‍या SIR के पीछे नागरिकता का मुद्दा तो नहीं था?

January 23, 2026

नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बिहार (Bihar) में मतदाता सूची (Voter list) के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को लेकर निर्वाचन आयोग (ECI) की मंशा पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने गुरुवार को आयोग से स्पष्ट रूप से पूछा कि क्या इस पूरी कवायद को शुरू करते समय उसके दिमाग में ‘नागरिकता’ (Citizenship) का निर्धारण मुख्य उद्देश्य था? मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ बिहार में पिछले साल 24 जून को जारी उस अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसके तहत मतदाता सूची में व्यापक संशोधन किया गया है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा ‘प्रवास’ (Migration) को आधार बनाए जाने पर टिप्पणी की। पीठ ने कहा, “आमतौर पर ‘प्रवास’ शब्द का अर्थ कानूनी रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से होता है। एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवास करना एक संवैधानिक अधिकार है। आपकी अधिसूचना में सीमा पार से होने वाले या अवैध प्रवास का स्पष्ट जिक्र नहीं है।” अदालत ने आगे कहा कि यदि आयोग अंतर-राज्यीय प्रवास या गलत प्रविष्टियों के आधार पर इस संशोधन का बचाव कर रहा है तो फिर नागरिकता का बड़ा मुद्दा इसमें कहीं फिट नहीं बैठता।


  • 20 साल बाद क्यों पड़ी विशेष जांच की जरूरत?
    चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह ने दलील दी कि बिहार में साल 2003 के बाद से कोई ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ नहीं हुआ था। उन्होंने तर्क दिया कि पिछले 20 वर्षों में केवल ‘सारांश संशोधन’ किए गए, जिसमें मतदाता की स्व-घोषणा को ही नागरिकता का आधार मान लिया जाता था और कोई गहन जांच नहीं होती थी। आयोग ने कहा कि इन दो दशकों में शहरीकरण और प्रवास के कारण जनसांख्यिकीय स्थितियों में बड़े बदलाव आए हैं, जिसे देखते हुए यह कदम उठाना अनिवार्य था।

    2003 के नागरिकता संशोधन का हवाला
    आयोग के वकील ने 2003 के नागरिकता (संशोधन) अधिनियम का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस कानून ने नागरिकता साबित करने के लिए माता-पिता की नागरिकता जैसे कड़े प्रमाणों की आवश्यकता पेश की थी। आयोग के अनुसार, वर्तमान पुनरीक्षण इस कानूनी ढांचे को लागू करने का एक सही अवसर था।

    जब कोर्ट ने पूछा कि क्या यह कानून ही इस संशोधन का मुख्य कारण था, तो आयोग ने स्वीकार किया कि इस संशोधन ने बदले हुए कानूनी ढांचे को ध्यान में रखने का मौका दिया।

    66 लाख नाम हटे, पर पीड़ित चुप क्यों?
    चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं (NGO और कुछ राजनेताओं) की मंशा पर भी सवाल उठाए। आयोग ने तर्क दिया कि बिहार में इस प्रक्रिया के दौरान कुल 66 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इनमें से एक भी व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर न तो चुनाव आयोग गया और न ही किसी अदालत। आयोग ने इसे ‘रोविंग एंड फिशिंग इंक्वायरी’ (बिना ठोस आधार के छानबीन) करार देते हुए कहा कि एडीआर (ADR) और पीयूसीएल (PUCL) जैसे संगठनों के कहने पर पूरी प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

    कोर्ट ने इस बात पर आयोग की सराहना की कि अभी तक किसी भी प्रभावित व्यक्ति ने इसके खिलाफ अपील नहीं की है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि वे केवल यह समझना चाहते हैं कि इस संशोधन के पीछे आयोग की वास्तविक सोच क्या थी। इस मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को की जाएगी।

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