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उल्टे निकल रहे ट्रंप की विदेश नीति के नतीजे… EU-India ने कर ली डील, चीन से हाथ मिला रहे कनाडा-बिट्रेन

January 29, 2026

वाशिंगटन। अमेरिका (America) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) अपनी विदेश नीति से जो भी हासिल करने निकले हों, नतीजा उल्टा निकलता दिख रहा है। ईयू-भारत ने डील (EU-India deal) कर ली। हाल तक एक-दूसरे के लिए आक्रामक रहे कनाडा और चीन हाथ मिला रहे हैं और करीब आठ साल बाद कोई ब्रिटिश पीएम (British PM) चीन पहुंच रहे हैं। कभी अमेरिकी खेमे का अनिवार्य अंग रहे पश्चिमी देश अपने हितों की तलाश में एशिया का रुख कर रहे हैं। इस शृंखला में ताजा नाम है, ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर। चीन के साथ राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने का मकसद लिए स्टार्मर 28 जनवरी को बीजिंग पहुंचे हैं।

ट्रंप चाहते कुछ हैं, हो कुछ और रहा है?
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह माने जा रहे हैं ट्रंप। अमेरिकी राष्ट्रपति का मनमाना और एकतरफा रवैया इतना नियमित हो गया है कि पश्चिमी सहयोगियों के लिए हैरान होने की भी सहूलियत नहीं बची है। विश्लेषकों के मुताबिक, पश्चिमी गठबंधन की हालत डांवाडोल है और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी वक्त गंवाए बिना अपने लिए बैकअप खोज रहे हैं। मसलन, करीब दो दशक से भारत और ईयू में व्यापारिक समझौते पर सहमति नहीं बन पाई थी। अब ट्रंप फैक्टर ने बातचीत को इतनी रफ्तार दे दी कि डील हो गई।


  • ब्रिटेन और अमेरिका सबसे करीबी दोस्त रहे हैं। ब्रिटेन अब भी अमेरिका को अपना सबसे प्राथमिक सहयोगी मानता है। पहले यह भावना साझा थी, लेकिन ट्रंप के आने के बाद खासतौर पर ट्रंप 2.0 में ब्रिटेन अब इस दोस्ती पर आश्वस्त रहने की हालत में नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में किएर स्टार्मर बतौर प्रधानमंत्री पहली बार चीन पहुंचे हैं। बल्कि, आठ साल बाद यह पहली बार है जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चीन गए हैं। पिछली बार मई 2018 में थिरेसा मे चीन गई थीं।

    अपनी यात्रा का आशय स्पष्ट करते हुए स्टार्मर ने कहा कि चीन जिस तरह के आर्थिक मौके दे रहा है, उसकी अनदेखी कर पाना ब्रिटेन के लिए मुमकिन नहीं होगा। बीजिंग जाते हुए अपने विमान में पत्रकारों से बात करते हुए स्टार्मर ने शुतुरमुर्ग के रेत में सिर घुसाने वाली कहावत दोहराते हुए कहा कि चीन से “बातचीत करना हमारे हित में है। यह ट्रिप हमारे लिए वाकई अहम होने वाली है और हम असल में आगे बढ़ेंगे।” चीन में स्टार्मर की मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से होनी है। इसके बाद 30 जनवरी को वह स्थानीय कारोबारियों से बातचीत के लिए शंघाई जाएंगे। स्टार्मर अपने साथ 50 से ज्यादा कारोबारियों का प्रतिनिधिमंडल ले गए हैं।

    स्वाभाविक सहयोगी नहीं रहे हैं चीन और ब्रिटेन?
    औपनिवेशिक अतीत और सम-सामयिक रिश्तों का भार चीन और ब्रिटेन के रिश्तों का स्वभाव तय करता आया है। इसमें हांगकांग भी एक कारक है, जो कभी ब्रिटेन के नियंत्रण में था। यहां राजनीतिक आजादी का दमन और मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकारों की स्थिति, दोनों देशों के बीच रुखेपन की वजह रही। उसपर यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस के लिए चीन के समर्थन ने दोनों के हितों को विरोधाभासी बनाया।

    5जी नेटवर्क देने वाली चीनी कंपनियों पर गहरा अविश्वास, ब्रिटेन की सुरक्षा चिंताओं का एक हिस्सा है। वह चीन को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम मानता है। ब्रिटिश खुफिया सेवाओं का आरोप है कि चीन उनके अधिकारियों और नेताओं की जासूसी करवाता है, ब्रिटेन के सार्वजनिक जीवन में दखल देने और आलोचकों-विरोधियों को डराने की कोशिश करता है। इस तरह के मुद्दे और आरोप-प्रत्योरोप सालों से दोनों देशों के संबंध को दिशा देते आए हैं।

    ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई5 के प्रमुख केन मैककैलम ने चेताया था कि ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “चीन के स्टेट ऐक्टर्स” जोखिम हैं। ऐसे में स्टार्मर की यात्रा चीन और ब्रिटेन के आपसी रिश्तों में गर्माहट लाने का एक अहम बिंदु बन सकती है। हालांकि, स्टार्मर कह चुके हैं कि चीन की तरफ से मिलने वाले आर्थिक मौकों को लेने के लिए वह “राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता” नहीं करेंगे।

    स्टार्मर की चीन यात्रा पर हावी है ट्रंप फैक्टर?
    ट्रंप का रुख और यूरोपीय देशों के प्रति बहुत हद तक उनका अपमानजनक रवैया, स्टार्मर की चीन यात्रा का प्रमुख बैकड्रॉप मानी जा रही है। स्टार्मर की छवि ऐसे नेता की रही है जो गहरे तनाव के बीच भी अमेरिका के साथ सहयोग जारी रखने को अपना कंपास बनाकर चलते हैं। कई झटकों और सार्वजनिक फब्तियों के बावजूद वह ट्रंप पर बहुत नापतौल कर बोलते आए हैं। मगर बीते दिनों तीन ऐसे प्रकरण हुए, जहां स्टार्मर का रवैया और बयान अपेक्षाकृत सख्त रहा।

    पहला प्रकरण ग्रीनलैंड से जुड़ा है, जब ट्रंप ने वहां सैन्य अभ्यास के लिए अपने सैनिक भेजने वाले यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दी। फिर, ट्रंप ने चागोस द्वीपसमूह मॉरीशस की संप्रभुता मॉरीशस को लौटाने के लिए ब्रिटेन की सार्वजनिक तौर पर आलोचना की। इसके अलावा, अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों के योगदान पर ट्रंप की टिप्पणी ने भी काफी असहज स्थिति पैदा की।

    कई लीडर मुखरता से कह रहे हैं कि अमेरिका की बदली प्राथमिकताओं के मद्देनजर अब यूरोपीय ब्लॉक के लिए दूसरी जगहों पर अपने हित तलाशना अनिवार्य सा हो गया है। हाल ही में दावोस में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में भी यह बात कई बार सुनाई दी। यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने पत्रकारों से कहा, “हम जानते हैं हमें एक आजाद यूरोप की तरह काम करना होगा।”

    पॉलिटिको के लिए एक लेख में17 विशेषज्ञों ने बताया कि किस तरह दुनिया अमेरिका से दूर होते हुए नए अवसर खोज रही है। इसी आर्टिकल में ‘कार्निगी एनडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के सीनियर फेलो स्टीवर्ट पैट्रिक लिखते हैं, “हम कभी जिस वैश्विक व्यवस्था को जानते थे, वो मर चुकी है। ट्रंप प्रशासन इसका हत्यारा भी है और वह भी, जिसपर इसके अंतिम संस्कार का दायित्व है। पुराने सहयोगी भी अब इस सच्चाई के साथ तारतम्य बिठाने लगे कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक शिकारी सुप्रीम लीडर बन गया है।”

    पैट्रिक ने लिखा कि किस तरह ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों ने अपने कूटनीतिक पोर्टफोलियो में विवधता लाना शुरू कर दिया था। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का दूसरा साल शुरू होते-होते ये कोशिशें सबसे ऊपर के गीयर में पहुंच गई हैं। इस एहसास के साथ ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देश आर्थिक और सुरक्षा समीकरणों में विविधता लाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल वे ट्रंप को सीधे से नाराज नहीं करने का प्रयास भी कर रहे हैं। हालांकि, ट्रंप की राजनीतिक शैली के हिसाब से यह आसान नहीं होगा।

    जैसा कि पूर्व विदेश सचिव जेरमी हंट ने बीबीसी से बातचीत में ध्यान दिलाया कि प्रधानमंत्री के आगे वाकई एक कूटनीतिक मुश्किल है, “चीन के साथ ज्यादा व्यापार से बेशक कुछ फायदे होंगे, लेकिन इसमें बहुत बड़ा जोखिम भी है।” स्टार्मर भी लगातार कहते रहे हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच सहयोग का इतिहास कितना समृद्ध और पुराना है। ग्रीनलैंड के मुद्दे पर जब ट्रंप ने टैरिफ का एलान किया, तो अपना विरोध जताते हुए भी स्टार्मर ने ब्रिटेन और अमेरिका के गहरे रिश्तों की याद दिलाई। चीन जाते हुए भी उन्होंने यह दोहराया, “संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ हमारा जो रिश्ता है, वह हमारे सबसे करीबी संबंधों में से एक है। रक्षा में, सुरक्षा में, खुफिया सेवाओं और व्यापार समेत बहुत से क्षेत्रों में है।”

    चीन को लेकर स्टार्मर पर घरेलू दबाव भी है
    चीन जाने की अहमियत को रेखांकित करते हुए पीएम ने कहा कि ब्रिटेन में आर्थिक विकास को गति देने और जीवनस्तर सुधारने की उनकी योजनाओं को पूरा करने में यह मददगार होगा। हालांकि, स्टार्मर की इस रणनीति की घर और बाहर, खासकर अमेरिका में आलोचना भी हो रही है। चीन और ब्रिटेन की राजनीतिक व्यवस्था का आधारभूत अंतर भी संदेह की एक बड़ी वजह है। बीजिंग के प्रति कायम अविश्वास के मद्देनजर आशंका जताई जा रही है कि स्टार्मर चीन की ओर से मिल रहे सुरक्षा जोखिमों को कम करके आंक रहे हैं।

    विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी की नेता केमी बाडेनॉख ने कहा, “बात जब चीन की हो, तो किएर स्टार्मर बहुत ज्यादा कमजोर हैं।” हां, हमें चीन के साथ रिश्ता चाहिए। लेकिन, चीन लोकतंत्र में यकीन नहीं करना। उसने हमारे सांसदों पर प्रतिबंध लगाया, वह वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था में व्यवधान डालता है और ताइवान पर उसकी योजनाएं हैं।

    स्टार्मर पर जिनपिंग के साथ वार्ता में कुछ खास मुद्दों को उठाने का दबाव है। इनमें तीन मुद्दे अहम हैं। एक, लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता जिमी लाई की कैद। जिमी ब्रिटिश नागरिक हैं और जिस तरह उनपर मुकदमा चलाया गया और सजा सुनाई गई, उसपर गंभीर सवाल हैं। ब्रिटेन में एक वर्ग स्टार्मर से अपेक्षा करता है कि वह मजबूती से जिमी लाई को रिहा करने की मांग करें। इसके अलावा, वह चीनी नेतृत्व से यूक्रेन युद्ध पर दो-टूक बात करें और बेलाग कहें कि वे रूस पर लड़ाई खत्म करने का दबाव बनाएं। तीसरा विषय, उइगर अल्पसंख्यकों का भी मुद्दा उठाएं।

    स्टार्मर ये मसले उठाएंगे या नहीं, इसका उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया है। बल्कि चीन रवाना होने से पहले जब उनसे इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। चीनी लीडरों के साथ वह किन मुद्दों पर बात करेंगे, इस विषय में भी बात करने से वह हिचकते दिखे। उन्होंने कहा, “अतीत में, मैंने जितनी भी यात्राएं की हैं, उनमें मैंने हमेशा उन मुद्दों को उठाया है जिन्हें उठाए जाने की जरूरत है। लेकिन मैं समय से पहले ही इन ब्योरों पर बात नहीं करना चाहता।”

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