
जबलपुर। मध्य प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाया है। एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने जबलपुर सहित भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और रीवा जैसे बड़े नगर निगमों को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि हरित क्षेत्रों और जलाशयों के पास कचरा फेंकना व जलाना बंद नहीं हुआ, तो भारी आर्थिक दंड भुगतना होगा। जबलपुर जैसे 10 लाख से अधिक आबादी वाले महानगरों के लिए यह जुर्माना 10 लाख रुपए प्रति माह तय किया गया है। ?नितिन सक्सेना की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने पाया कि निकायों द्वारा ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन में लगातार लापरवाही बरती जा रही है। ट्रिब्यूनल ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है और स्थानीय निकाय इसका उल्लंघन कर रहे हैं।
जबलपुर में नर्मदा और जलाशयों की सुरक्षा पर संकट
जबलपुर में नर्मदा नदी के तटों और शहर के अन्य जल निकायों के आसपास कचरा डंपिंग एक गंभीर समस्या बनी हुई है। एनजीटी ने निर्देश दिया है कि गंदे पानी को सीधे जल निकायों में छोडऩे या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित न करने वाले निकायों पर 5 से 10 लाख रुपए प्रति माह का जुर्माना लगाया जाएगा। यह जुर्माना प्रति प्लांट या प्रति नाला के आधार पर होगा। जबलपुर नगर निगम को अब अपनी अनुपालन रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि शहर का कितना सीवेज शोधित होकर नदी में मिल रहा है। कचरा पृथक्करण, रिसाइकलिंग और वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट की कार्यप्रणाली को लेकर भी जबलपुर को अब तकनीकी डेटा प्रस्तुत करना होगा।
लापरवाह अधिकारियों की एसीआर में दर्ज होगी एडवर्स एंट्री
एनजीटी का यह आदेश केवल आर्थिक दंड तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही भी तय करता है। ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया है कि जो अधिकारी कचरा प्रबंधन के नियमों को लागू करने में विफल रहेंगे, उनकी गोपनीय चरित्रावली में प्रतिकूल प्रविष्टि की जाएगी। इसका सीधा असर अधिकारियों के प्रमोशन और भविष्य के करियर पर पड़ेगा। इसके साथ ही, जबलपुर नगर निगम को तत्काल एक च्पर्यावरण सेलज् गठित करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें विशेष रूप से प्रशिक्षित अधिकारी तैनात किए जाएंगे। यह सेल केवल पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के मानकों की निगरानी करेगा।
आबादी के हिसाब से तय हुआ पर्यावरण मुआवजा
एनजीटी ने जुर्माने की राशि को निकाय की आबादी और प्रदूषण की गंभीरता के आधार पर वर्गीकृत किया है। जबलपुर, इंदौर, भोपाल और ग्वालियर जैसे 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों को नियमों के उल्लंघन पर प्रति माह 10 लाख रुपए का पर्यावरणीय मुआवजा देना होगा। 5 से 10 लाख की आबादी वाले निकायों के लिए यह राशि 5 लाख रुपए और छोटे निकायों के लिए 1 लाख रुपए तय की गई है। यदि स्थानीय निकाय यह जुर्माना भरने में असमर्थ रहते हैं, तो इसकी वसूली सीधे राज्य सरकार के खजाने से की जाएगी। साथ ही, पैकेजिंग कचरा फैलाने वाली बड़ी कंपनियों और ब्रांड्स को भी कचरा निपटान में आर्थिक सहयोग देने के लिए उत्तरदायी बनाया गया है।
13 फरवरी तक प्रगति रिपोर्टदेने की समय सीमा
ट्रिब्यूनल ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी निर्देश दिए हैं कि वे उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें और पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करें। वर्तमान में शहरों के ग्रीन बेल्ट की स्थिति का हवाला देते हुए एनजीटी ने कहा कि डंपिंग साइटों से बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों की सेहत के लिए घातक है। इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी को निर्धारित की गई है। तब तक जबलपुर नगर निगम सहित सभी संबंधित विभागों को विस्तृत प्रगति रिपोर्ट और भविष्य की कार्ययोजना ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश करनी होगी।
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