
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने देश के कई राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर (On Anti-conversion Laws in force in several States) नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा (Has issued Notice and sought Response within Four Weeks) ।
नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया (एनसीसीआई) द्वारा दायर इस याचिका में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश और ओडिशा के ऐसे कानूनों को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है। कोर्ट ने संबंधित राज्यों से चार हफ्तों के अंदर जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया है कि ये कानून मौलिक अधिकारों, खासकर धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत आजादी और समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। याचिकाकर्ता ने अंतरिम राहत की भी मांग की है, जिसमें इन कानूनों के तहत पुलिस या राज्य प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई न करने का निर्देश देने की अपील की गई है। उनका तर्क है कि ये कानून अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर ईसाई और अन्य धार्मिक समूहों के खिलाफ दुरुपयोग हो रहे हैं और झूठे आरोपों के आधार पर उत्पीड़न बढ़ा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला पहले से लंबित अन्य याचिकाओं के साथ सुना जाएगा। ये पुरानी याचिकाएं भी विभिन्न राज्यों के समान कानूनों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाती हैं और 2020 से कोर्ट में विचाराधीन हैं। कोर्ट ने कहा कि इस पूरे मुद्दे पर तीन जजों की बेंच सुनवाई करेगी, ताकि सभी पहलुओं पर गहन विचार हो सके। ये कानून आमतौर पर जबरदस्ती, लालच, धोखे या शादी के जरिए धर्म परिवर्तन को रोकने के नाम पर बनाए गए हैं। इनमें पूर्व अनुमति लेने, घोषणा करने और सजा के प्रावधान शामिल हैं।
याचिकाकर्ता मानते हैं कि ये प्रावधान निजता और धार्मिक चुनाव की स्वतंत्रता पर हमला करते हैं। कई संगठन और समुदाय इन कानूनों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल होने का आरोप लगाते हैं। यह सुनवाई धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण बहस को आगे बढ़ाएगी। कोर्ट के इस कदम से इन कानूनों की वैधता पर अंतिम फैसला आने की उम्मीद बढ़ गई है, जो देश की धर्मनिरपेक्षता और मौलिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा है।
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