
नई दिल्ली। बांग्लादेश (Bangladesh) में गुरुवार, 12 फरवरी को होने वाला आम चुनाव (general election) सिर्फ देश की लोकतांत्रिक इच्छा की परीक्षा नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में संभावित बदलावों का संकेत भी देगा। इस चुनाव में बांग्लादेशी मतदाता मध्यमार्गी बीएनपी (BNP) और इस्लामवादी जमात-ए-इस्लामी पार्टी (Jamaat-e-Islami Party) के बीच चयन करेंगे, और साथ ही यह तय करेंगे कि कौन सा राजनीतिक विकल्प संस्थाओं की मजबूती और सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के बीच शासन करने में सक्षम है।
भारत के लिए भी इस चुनाव का महत्व बहुत बड़ा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है। लगातार सड़क प्रदर्शन, प्रशासनिक फेरबदल, हिंसा और हड़ताल ने राजनीतिक पृष्ठभूमि को बेहद अस्थिर बना दिया है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि निर्वाचित सरकार अंतरिम और विवादित सरकार की तुलना में बेहतर विकल्प होगी, लेकिन यह चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष नहीं माना जा रहा क्योंकि एक प्रमुख दल को चुनाव से बाहर रखा गया है और धमकियों का दौर जारी है।
इस चुनाव में बांग्लादेश के नागरिक दो वोट डालेंगे – एक सरकार चुनने के लिए और दूसरा जनमत संग्रह के लिए। विशेषज्ञों के अनुसार अवामी लीग की अनुपस्थिति में चुनाव तीन विकल्पों तक सिमट जाता है – बीएनपी का प्रभुत्व, बीएनपी और जमात का गठबंधन, या जमात का प्रभुत्व। बीएनपी की राजनीति भारत-विरोधी रही है, लेकिन व्यावहारिक और मध्यमार्गी आर्थिक नीतियों का समर्थन करती रही है। ‘द न्यूयॉर्क एडिटोरियल’ ने ‘इनोविजन कंसल्टिंग’ के सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए बताया कि बीएनपी को 52.8 प्रतिशत वोट शेयर का बढ़त मिल रही है, जबकि जमात के साथ लगभग 22 प्रतिशत का अंतर है।
यदि अवामी लीग के पूर्व मतदाता बीएनपी के पक्ष में वोट देते हैं, तो तारिक रहमान आसानी से सत्ता तक पहुँच सकते हैं। भारतीय पर्यवेक्षक मानते हैं कि बीएनपी का नेतृत्व करने वाले तारिक रहमान के साथ भारत काम कर सकता है, जबकि जमात के साथ पिछला अनुभव सुखद नहीं रहा है। जमात ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के साथ संबंध और चीन को लुभाने के प्रयास किए हैं, जिससे भारत के लिए यह एक तिहरा चुनौती बन जाता है। शेख हसीना की बेदखली के बाद शिक्षा और प्रशासनिक संस्थानों में जमात का प्रभाव बढ़ा, और कई उग्रवादी समूह रिहा हो गए, जिन्हें भारतीय सुरक्षा एजेंसियां सावधानी से मॉनिटर कर रही हैं।
भारतीय रणनीति लंबे समय से व्यावहारिक रही है। ढाका में सत्ता में रहने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ जुड़ाव आवश्यक माना जाता रहा है, लेकिन पिछले 18 महीनों में दिखाए गए धैर्य की परीक्षा इस चुनाव में हो सकती है। इस चुनाव का नतीजा न केवल बांग्लादेश के लिए बल्कि भारत के रणनीतिक और सुरक्षा हितों के लिए भी निर्णायक साबित होगा।
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