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IRDA: गलत तरीके, झूठे वायदों के आधार पर बेच रहे बीमा पॉलिसी…कमीशन पर लगाम लगाने की तैयारी

February 12, 2026

नई दिल्ली। बीमा नियामक इरडा (Insurance Regulator IRDA) ने बीमा कंपनियों (Insurance Companies) के प्रमुखों के सामने गलत तरीके, झूठे वायदों के आधार पर बीमा पॉलिसी बेचने पर चर्चा की। सूत्रों के मुताबिक, उनकी बैठक में जीवन बीमा कंपनियों ने स्थगित कमीशन भुगतान मॉडल (Commission Payment Model) का सुझाव दिया है। इसमें एजेंट को पूरा कमीशन एक साथ नहीं, बल्कि पॉलिसी की पूरी अवधि के दौरान दिया जाएगा।

बताया जा रहा है इन सुझावों में कॉरपोरेट एजेंट्स के लिए पांच साल और व्यक्तिगत एजेंट्स के लिए तीन साल का प्रस्ताव दिया गया है। इसका मकसद साफ है, बीमा पॉलिसी के गलत बिक्री रोकना, कंपनियों का खर्च घटाना और ग्राहकों को सस्ता, टिकाऊ बीमा देना। वैसे खास बात यह है कि हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक और आर्थिक सर्वेक्षण में भी ऊंचे कमीशन पर सवाल उठाए गए थे।


  • 60,800 करोड़ रुपये से अधिक कमीशन भुगतान
    दरअसल, इरडा और बीमा कंपनियों के प्रमुखों की यह मुलाकात बीमा कंपनियों के कमीशन भुगतान से जुड़े बढ़ते खर्चों और नियामिकीय सीमाओं को लेकर हो हुई थी। बताया जा रहा है कि इस बैठक का आधार वित्त वर्ष 2025 में, जीवन बीमा कंपनियों के कमीशन भुगतान 60,800 करोड़ रुपये से अधिक रहना था। जबकि साधारण बीमा कंपनियों के माले में यह भुगतान आंकड़ा 47,000 करोड़ रुपये के पार चला गया।

    इन बढ़ते खर्चों के चलते कई कंपनियां अपने प्रबंधन खर्च की सीमा को पार कर चुकी हैं। इस स्थिति को देखते हुए बीमा नियामक नए नियमों लाने पर विचार कर रहा है। ये नियम अगले कुछ महीनों में जारी किए जा सकते हैं। पिछले एक दशक में पॉलिसी की संख्या में ठहराव के बावजूद खर्चों में लगभग 9.4% सालाना की वृद्धि हुई है। गैर-जीवन बीमा में स्वास्थ्य बीमा सबसे आगे है, जिसका कुल गैर जीवन बीमा प्रीमियम में 41% हिस्सा है।

    बदलाव की जरूरत क्यों पड़ रही
    एजेंट को पहले साल ही बहुत ज्यादा कमीशन मिल जाता है। इसी कारण से कई बार गलत पॉलिसी बेच दी जाती है। इससे बीमा कंपनियों का खर्च भी बढ़ जाता है।कई पॉलिसियां बीच में ही बंद हो जाती हैं। इरडा कमीशन को पॉलिसी की उम्र से जोड़ना चाहता है ताकि एजेंट जिम्मेदार बनें और ग्राहक को सस्ता, टिकाऊ बीमा मिले।

    क्या है स्थगित कमीशन का मतलब
    डिफर्ड कमीशन का मतलब ये है कि बीमा एजेंट को पूरा कमीशन एक साथ नहीं मिलता, कमीशन पॉलिसी के साथ-साथ सालों में किस्तों में दिया जाता है। इससे एजेंट पॉलिसी को चालू रखने और ग्राहक की सेवा करने में ज्यादा रुचि लेता है। पॉलिसी जितने लंबे समय तक चलेगी, एजेंट को उतना ही कमीशन मिलता रहेगा। शुरुआती सालों में थोड़ा ज्यादा और बाद के सालों में थोड़ा कम, लेकिन लगातार मिलता रहेगा।

    कमीशन पर सख्ती के संभावित खतरे
    कमीशन भुगतान में यह अप्रत्याशित उछाल भारतीय बीमा सेक्टर के लिए बड़े जोखिम पैदा कर रहा है। कंपनियों का यह तर्क कि डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल के विकास के लिए उच्च कमीशन आवश्यक है। कमीशन पर कड़े और एकसमान सीमा लगाने से एजेंसी-आधारित नेटवर्क और बैंकएश्योरेंस पार्टनरशिप जैसे स्थापित डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को गंभीर झटका लग सकता है, जो बाजार तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

    इससे वितरकों और बीमाकर्ताओं दोनों के लिए बिजनेस की मात्रा कम हो सकती है, जो बाजार को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, पारंपरिक उत्पादों पर 60-70% तक पहुंचने वाले अग्रिम कमीशन, गलत बिक्री और पॉलिसीधारकों के मूल्य के कमी की चिंताएं बढ़ाते हैं।

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