
नई दिल्ली। फ्रांस में महंगाई, बढ़ते खर्च और स्कूलों की बदहाल स्थिति के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के हिंसक रूप लेने के बाद सरकार ने सख्त कदम उठाने का फैसला किया है। रायटर्स के अनुसार, कई शहरों में तोड़फोड़ और लूटपाट के बाद प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नु ने स्थानीय प्रशासन को जरूरत के मुताबिक सीमित क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाने का निर्देश दिया है।
उन्होंने आपातकाल लागू करने की संभावना से भी इनकार नहीं किया है। उधर, तमाम यूनियनों ने पांच नवंबर को राष्ट्रीय हड़ताल का आह्वान कर दिया है।
यूरोपीय सरकारों ने फ्रांस समेत छह देशों में यात्रा को लेकर सलाह जारी की है। भीड़ वाली जगहों से नागरिकों को बचने को कहा गया है। सरकार ने देशभर में करीब 60 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात किए हैं। हिंसा के सिलसिले में 2400 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि करीब एक हजार पुलिसकर्मी और सुरक्षाकर्मी घायल हुए हैं
मार्सेय में विरोध प्रदर्शनों या जमावड़े पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कई शहरों में सरकारी इमारतों और दुकानों को निशाना बनाया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, करीब तीन हजार दुकानों को नुकसान पहुंचा है। पेरिस और मार्सेय में बड़े पैमाने पर लूटपाट की घटनाएं सामने आई हैं।
तमाम शहरों के मेयरों ने पुलिस के लचर रवैये पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि ऐसा लगा ही नहीं कि देश में पुलिस व्यवस्था है। फ्रांस के अखबार ली मोंड के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हिंसक प्रदर्शनों के लिए अवैध अप्रवासियों को जिम्मेदार माना है।
गृह मंत्री ने मानी सुरक्षा में चूक
एपी के अनुसार, हिंसा पर काबू पाने में नाकामी के बीच गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने इस्तीफे की पेशकश की, लेकिन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने फ्रांस के इंटर रेडियो से बातचीत में कहा कि देश में जो कुछ भी हुआ उसके लिए मैं जिम्मेदार हूं। नुनेज ने हिंसा के लिए उपद्रवियों और लूटपाट करने वालों की भीड़ तथा कट्टर वामपंथी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराया।
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