
नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ मनोरंजन तक सीमित (Limited to entertainment)नहीं रहतीं बल्कि समय के साथ एक मिसाल बन जाती हैं। साल 1988 में रिलीज(Released in 1988) हुईसलाम बॉम्बे( Salaam Bombay)ऐसी ही एक कल्ट क्लासिक फिल्म है जिसने न सिर्फ दर्शकों का दिल जीता बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई। बेहद कम बजट में बनी इस फिल्म ने अपनी सशक्त कहानी(A Powerful Story) और दमदार अभिनय के दम पर तीन राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किए और ऑस्कर तक का सफर तय किया।
इस फिल्म का निर्देशन Mira Nair ने किया था और इसमें Nana Patekar Raghubir Yadav और बाल कलाकार Shafiq Syed जैसे कलाकार नजर आए थे। फिल्म का रनटाइम करीब 1 घंटा 35 मिनट था लेकिन इसकी कहानी और प्रभाव लंबे समय तक दर्शकों के दिलो दिमाग में बना रहा।
इस फिल्म से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है जो आज भी लोगों को हैरान कर देता है। दरअसल फिल्म के क्लाइमेक्स सीन की शूटिंग के दौरान एक खतरनाक हादसा हो गया था। सीन के मुताबिक शफीक सैयद का किरदार कृष्णा नाना पाटेकर के किरदार पर चाकू से हमला करता है। इस सीन को फिल्माने के लिए पूरी तैयारी की गई थी और सुरक्षा के तौर पर नाना पाटेकर के पेट पर टायर बांधा गया था ताकि चाकू उन्हें नुकसान न पहुंचा सके।
लेकिन शूटिंग के दौरान एक छोटी सी चूक भारी पड़ गई। जब शफीक सैयद ने सीन के अनुसार चाकू मारा तो वह टायर को पार करते हुए सच में नाना पाटेकर के पेट में जा लगा। इससे उनके पेट से खून बहने लगा लेकिन हैरानी की बात यह रही कि नाना पाटेकर ने सीन को बीच में नहीं रोका और अभिनय जारी रखा। सेट पर मौजूद लोगों को लगा कि यह सब उनकी शानदार एक्टिंग का हिस्सा है और वे उनकी तारीफ करने लगे।
कुछ देर बाद जब स्थिति स्पष्ट हुई तब सभी को एहसास हुआ कि यह कोई अभिनय नहीं बल्कि असली हादसा था। इसके बाद तुरंत उनका इलाज कराया गया। यह घटना नाना पाटेकर की प्रोफेशनलिज्म और अपने काम के प्रति समर्पण को दर्शाती है।
फिल्म की बात करें तो करीब 20 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने लगभग 45 लाख की कमाई की थी और बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हुई थी। आज भी इसकी IMDb रेटिंग 7.9 के आसपास बनी हुई है जो इसकी गुणवत्ता को दर्शाती है।
पुरस्कारों की बात करें तो Salaam Bombay! ने 1989 में तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। शफीक सैयद को बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला जबकि मीरा नायर को बेस्ट रीजनल फिल्म के लिए सम्मानित किया गया। इसके अलावा फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
इस फिल्म ने एक और बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया। Mother India के बाद यह दूसरी भारतीय फिल्म बनी जिसे ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट किया गया।
कुल मिलाकर सलाम बॉम्बे सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा का एक ऐसा अध्याय है जिसमें संघर्ष, यथार्थ और सिनेमा की ताकत का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। आज भी यह फिल्म और इससे जुड़ी कहानियां लोगों को उतना ही प्रभावित करती हैं जितना इसके रिलीज के समय करती थीं।
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