
इंदौर, राजेश ज्वेल। भले ही इंदौर का मास्टर प्लान ठंडे बस्ते में पड़ा हो और दूसरी तरफ मेट्रोपॉलिटन रीजन का एरिया लगातार बढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ निवेश क्षेत्र में शामिल 79 गांवों में भी लम्बे समय से अनुमतियां ठप पड़ी है। मगर रियल इस्टेट से जुड़ी बड़ी कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए शासन ने इंटिग्रेटेड टाउनशिप पॉलिसी लागू कर दी है, जिसके चलते 50 एकड़ खेती की जमीन खरीदो और मुफ्त में भू-उपयोग परिवर्तन की सुविधा हासिल करते हुए आवासीय कॉलोनी काट दो और मास्टर प्लान प्रावधानों के साथ-साथ धारा 16 की झंझटों से भी मुक्ति पाओ। इंदौर में 450 एकड़ पर पॉलिसी आने से पहले ही एक टाउनशिप बड़े कॉर्पोरेट समूह द्वारा घोषित भी की जा चुकी है।
इंदौर का मास्टर प्लान-2021 पांच साल पहले ही समाप्त हो चुका है। हालांकि नए प्लान के लागू होने तक इसके प्रावधान जारी रहेंगे। मगर निवेश क्षेत्र में जो 79 नए गांव शामिल किए हैं उनमें सालभर पहले तक तो धारा 16 के तहत ऊपरी लेन-देन के जरिए नगर तथा ग्राम निवेश से अभिन्यास मंजूर हो रहे थे और 15 से 20 लाख रुपए प्रति एकड़ तक का रेट पहुंच गया। हालांकि कई कॉलोनाइजरों ने यह ऊपरी राशि चुकाकर धारा 16 में अनुमति लेकर अभिन्यास पास करवाए, क्योंकि उनके प्रोजेक्ट अधूरे पड़े थे। मगर उसके बाद मुख्य सचिव की आपत्ति के चलते धारा 16 का खेल भी बंद हो गया और नए मास्टर प्लान के प्रारुप प्रकाशन का भी कोई ठिकाना नहीं है। दूसरी तरफ पिछले दरवाजे से इंटिग्रेटेड टाउनशिप पॉलिसी को लाया गया, जिसमें इंदौर जैसे 5 लाख से अधिक की आबादी वाले शहर में मिनिमम 20 हेक्टेयर यानी 50 एकड़ पर टाउनशिप विकसित करने पर सुविधाओं का पिटारा खोल दिया गया।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मास्टर प्लान के कई प्रावधानों के विपरित अनुमतियां मिल जाएंगी और इतना ही नहीं, भू-उपयोग परिवर्तन की भी जरूरत धारा 23 या अन्य माध्यम से करवाने की आवश्यकता नहीं होगी, जिसके लिए अभी शासन भारी-भरकम फीस भी लेता है। मगर इंटिग्रेटेड टाउनशिप के नाम पर इन प्रोजेक्टों को मुफ्त में ही ये सुविधाएं हासिल हो जाएंगी और खेती यानी कृषि उपयोग से लेकर पीएसपी सहित अन्य सस्ती जमीनों को खरीदकर उस पर आवासीय कॉलोनी विकसित करने का लाइसेंस मिल जाएगा। हालांकि इसका लाभ छोटे कॉलोनाइजर या डवलपर नहीं ले पाएंगे। अभी जो गोदरेज जैसी बड़ी कम्पनियां रियल इस्टेट के कारोबार में आ रही हैं उन्हीं को इसका फायदा मिलेगा, क्योंकि 50 एकड़ जमीन एक साथ हासिल करना किसी अन्य डेवलपर के लिए संभव नहीं है। इस पॉलिसी में एक और मजेदार बात यह है कि 80 फीसदी जमीन अगर खरीद ली तो 20 फीसदी यानी 20 एकड़ तक सरकारी जमीन भी प्रोजेक्ट में शामिल की जा सकेगी और जो भी निर्धारित गाइडलाइन होगी उसके मान से शासन इसका पैसा जमा करवा लेगा। एक और बड़ा फायदा इस पॉलिसी में यह भी दिया जा रहा, जिसमें अगर कोई डेवलपर 50 एकड़ जमीन हासिल करने में असहाय रहता है तो उसके आसपास की निजी जमीनों का अधिग्रहण भी शासन-प्रशासन के माध्यम से करवाया जा सकेगा। जैसे अभी प्राधिकरण, हाउसिंग बोर्ड या अन्य सरकारी विभागों के लिए शासन खुद जमीनों का अधिग्रहण करवाता है, उसी तरह का तोहफा अब बड़े कॉलोनाइजरों को दिया जा रहा है। इंदौर क्रेडाई ने भी ऐसी तमाम विसंगतियों पर आपत्ति जताई है। क्रेडाई के अतुल झंवर का कहना है कि चूंकि अभी मास्टर प्लान नहीं आ रहा है और धारा 16 भी बंद है, जिसके चलते बड़े रियल इस्टेट के खिलाडिय़ों को फायदा पहुंचाने के लिए ये पॉलिसी लाई गई है।
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