
नई दिल्ली। कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) ने स्पष्ट किया है कि SC/ST अधिनियम (1989) की धारा 3(1)(r) के तहत किसी अनुसूचित जाति (scheduled caste) के सदस्य के हर अपमान को अत्याचार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक अपमान या धमकी सार्वजनिक रूप से नहीं की गई हो, तब तक कार्यस्थल या प्रशासनिक मतभेदों को इस एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
मामला क्या था
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता संस्कृत में बीए, एमए और पीएचडी कर चुकी हैं और संस्कृत कॉलेज एंड यूनिवर्सिटी में विभाग प्रमुख हैं। शिकायतकर्ता एक असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और SC समुदाय से संबंधित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग प्रमुख ने उन्हें विभागीय फैसलों में शामिल नहीं किया, क्लास रोक दी, एग्जाम ड्यूटी नहीं करने दी और ऑनलाइन मीटिंग के दौरान अपमानित किया। उनका दावा था कि यह सब उनकी जाति के कारण हुआ, जिससे उन्हें मानसिक पीड़ा हुई।
हाईकोर्ट का तर्क
जस्टिस चैताली चटर्जी दास की अदालत ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर आरोप पूरी तरह सच भी मान लिए जाएं, तो भी वे SC/ST एक्ट की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं करते।
जांच में पाया गया कि आरोप मुख्यतः विभाग के भीतर पेशेवर और प्रशासनिक विवादों से जुड़े थे। कोर्ट ने नोट किया कि किसी भी घटना में सार्वजनिक रूप से जाति-आधारित अपमान या गाली-गलौज नहीं हुई थी। न ही यह साबित हुआ कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित या धमकाया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘गोरीगे पेंटैया’, ‘हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य’ और ‘स्वर्ण सिंह बनाम राज्य’ के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 3(1)(r) के तहत अपराध माने जाने के लिए जरूरी है कि आरोपी SC/ST समुदाय का सदस्य न हो, अपमान या धमकाने का इरादा जानबूझकर किया गया हो, अपमान जाति पर आधारित हो, घटना सार्वजनिक रूप से हुई हो।
कोर्ट का फैसला
अदालत ने पाया कि शिकायत में ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे साबित हो कि याचिकाकर्ता ने जाति के कारण शिकायतकर्ता को निशाना बनाया। यह विवाद पेशेवर मतभेदों से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा और चार्जशीट को रद्द कर दिया।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved