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गीतों में सांस्कृतिक मर्यादा जरूरी

– ह्रदय नारायण दीक्षित

गीत नृत्य संस्कृति के अंग होते हैं। गीत मात्र शब्द संयोजन नहीं होते। इनमे भाव की महत्ता होती है। ये आनंद का संवर्धन करते हैं। सृजन आसान नहीं होता। कुछ सृजन मोहक होते हैं और कुछ मादक। गीत काव्य के रचनाकारों को सभ्यता और संस्कृति की मर्यादा का पालन करना चाहिए। वैदिक मंत्र भी काव्य हैं। रामायण और महाभारत महाकाव्य कहे जाते हैं। ऋग्वेद के ऋषि के सृजन में ऊषा सुंदरी हैं। कवि ऋषि ऊषा को पुराणी युवती कहते हैं। वह ‘सघः स्नात’ है- अभी अभी स्नान कर के आई है। सब उसे देखते हैं लेकिन उसके पति ही उसे पूरा देखते हैं।’ यहां ऊषा का सौन्दर्य दर्शन मर्यादा में है। रामकथा का काव्य मर्यादा पुरुषोत्तम से सम्बद्ध है ही। आनंद प्राप्ति वैदिक ऋषियों की अभिलाषा है। वे ज्ञान चर्चा में आनंदित होते हैं लेकिन ज्ञान चर्चा में आनंदित न होने वाले भी कम नहीं। ऋषि कवि वरुण मित्र देवो से प्रार्थना करते हैं कि ‘जो प्रश्न जिज्ञासा में आनंद नही प्राप्त करते, उनसे हमारी रक्षा करो (ऋ० 8.101.4) प्रकृति में आनंद के अनेक अवसर व उपकरण है। इसमें प्रश्न जिज्ञासा व संवाद भी महत्वपूर्ण है। कलाएं आनंद देती हैं। मर्यादा सभी कलाओं की अभिव्यक्ति की सीमा है।’

श्लील और अश्लील के विभाजन के मध्य एक महीन रेखा है। देह और दैहिक सम्बंधों की चर्चा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में संयम के अधीन रही है। सम्प्रति भोजपुरी गीतों के श्लील अश्लील तत्व को लेकर सोशल मीडिया में चर्चा है। भोजपुरी बोली अपने मूलरूप में प्रीति प्यार व आत्मीयता से भरी पूरी है। इस बोली के गीतो में रस माधुर्य है। शारदा सिन्हा के गीत भाव जगत में गहरे पैठे हैं। ऐसे भाव प्रवण गीत सैकड़ों की संख्या में हैं लेकिन पीछे कुछ समय से भोजपुरी गीतों में अश्लीलता बढ़ी है। अनेक गीत द्विअर्थी होते हैं। एक लोकप्रिय गायक ने ‘लगवा दो राजा जी मेरे लहंगा में मीटर’ गाया। सौंदर्य बोध और मर्यादा काव्य सृजन की मुख्य शर्त है। मर्यादाहीन गीतों में सौन्दर्यबोध नहीं होता। एक भोजपुरी गीत का मुखड़ा है – बांध के सर पर पगड़िया। लहरिया लूटो रे राजा। यह अश्लीलता है और अश्लीलता कभी भी सुन्दर नहीं होती। सुन्दर अश्लील नहीं शिव होता है। सत्य, शिव, और सुन्दर की त्रयी भारतीय कला और संस्कृति का मूल है। ऐसे गीतों के लेखक कम प्रतिभाशाली नहीं होते। प्रकृति और समाज में अनेक विषय हैं। प्रकृति सौन्दर्य से भरी पूरी है।

काव्य और कला सृजन भारत में प्राचीन है। इनका सतत विकास हुआ है। ऐसे माध्यम सामाजिक विकास के साथ साथ विकसित हुए हैं। पहला माध्यम भाषा है। भाषा प्राचीनतम माध्यम है। भाषा का रूप शब्दों से बना है। शब्द के गर्भ में अर्थ होते हैं। गीतकार कवि और लेखक भाषा का सदुपयोग करते हैं। शब्द गीत या लेख में उचित जगह प्रयोग किये जाते हैं। पतंजलि ने बताया है कि ‘एक ही शब्द अलग अलग स्थान पर प्रयुक्त होकर अलग अर्थ देते हैं।’ लिखने या काव्य गीत सृजन में उचित शब्द प्रयोग की महत्ता है। शब्द को उचित जगह देने से उचित अर्थ मिलते हैं। प्रकृति में भाव प्रवणता के लाखों रूप हैं। प्रकृति स्वयं गीत और कविता है। ऋतुएं प्रकृति का चेहरा हैं। बसंत, हेमन्त, शिशिर और वर्षा को भाव सहित देखने से गीत उगते हैं। चन्द्रमा वैसे एक ग्रह है लेकिन तमाम कवियों ने चांद-तारों पर सुंदर गीत लिखे हैं। वाल्मीकि ने प्रकृति को ध्यान से देखा था। रामायण में प्रकृति का सुंदर वर्णन है। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में मोहक शब्द चित्र बनाए हैं। भोजपुरी स्वयं में रसपूर्ण है। मानवीय रिश्तों पर भी गीत लिखे जा सकते हैं। ‘नदिया के पार’ फिल्म के गीत प्रेम से भरे पूरे हैं लेकिन सांस्कृतिक मर्यादा के बंधन में हैं। भोजपुरी गीतों में भी ऐसा ही होना चाहिए।

भारतीय सिनेमा अपने पुराने दौर में मर्यादित था। गीत प्रेमपूर्ण थे। सरस थे। उन्हें सुनने और गुनगुनाने में मजा आता था। शास्त्रीय बंधन वाले गीत आज भी तरुण और रस सिक्त हैं। अश्लीलता को लेकर भोजपुरी गीतों पर चर्चा है। लेकिन मुख्य धारा के सिनेमा में भी अश्लीलता की उपस्थिति है। इस पर चर्चा नहीं होती। एक समय दादा कोंडके की फिल्मों के गीत और संवाद द्विअर्थी होते थे। ‘चोली के पीछे क्या है? जैसे गीत लोकप्रिय तो थे। लेकिन मर्यादित नहीं थे। डेविड धवन की फिल्में सस्ती मनोरंजक हैं। इनकी एक फिल्म का गीत ‘सरका लेउ खटिया’ अश्लील क्यों नहीं है। हाल में ही आई सिम्बा फिल्म का ‘लड़की आंख मारे’ गीत अश्लील था। केवल भोजपुरी गीतों को ही आरोपित करना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य के सौन्दर्य बोध पर ध्यान देना चाहिए। आधुनिकता के समानांतर सौन्दर्य बोध के मानक बदले हैं। सौन्दर्य बोध सामाजिक सांस्कृतिक विकास का फल होता है। गीत संगीत की व्यापक चर्चा ऋग्वेद में है। वैसी महाभारत में नहीं है। ऋग्वेद के रचनाकाल का समाज आनंदगोत्री है। लेकिन महाभारत का समाज संपदा के लिए युद्ध को कर्तव्य मानता है। महाभारत में गीत संगीत महत्वपूर्ण नहीं है। उपनिषदों में संस्कृति दर्शन के तत्व हैं। वृहदारण्यक उपनिषद में परम विद्वान याज्ञवल्क्य मैत्रेयी को ब्रह्म विद्या बताते हैं। वे दुदुंभी शंख और वीणा जैसे संगीत उपकरणों के उदाहरण देते हैं। इसका अर्थ सुस्पष्ट है। शतपथ ब्राह्मण के रचनाकाल में भी संगीत की धारा का प्रवाह था। वृहदारण्यक उपनिषद शतपथ का ही हिस्सा है।

गीत-संगीत और कला सृजन की क्षमता भी सामाजिक सांस्कृतिक विकास का परिणाम होती है। गीत सुन कर हम प्रभावित होते हैं। लेकिन सब प्रभावित नहीं होते। प्रभावित होने के लिए भी विशेष प्रकार की बौद्धिक क्षमता की जरूरत होती है। प्रभावित करने की क्षमता के लिए विशेष बौद्धिक सांस्कृतिक क्षमता चाहिए। सभी प्राणी सुखी रहना चाहते हैं। प्राचीन वांग्मय में ज्ञान की महत्ता है। ज्ञान मुक्ति या मोक्षदाता भी कहा गया है। लेकिन ज्ञान प्राप्ति का सामान्य उद्देश्य सुखी जीवन है। मनुष्य सुख आनंद के स्रोत खोजा करता है। सौन्दर्य बोध से सुख मिलता है। गीत-संगीत को सुनना सुनाना आनंद देता है। कला सुख देती है। सुखी होने के लिए मनुष्य सुख के उपकरण बनाते हैं। तमाम नव सृजन करते रहते हैं। अश्लील गीत काव्य वास्तविक आनंद नहीं देते। श्लील सृजन दीर्घकालिक आनंद देते है। कलाएं चित्त को सांस्कृतिक बनाती हैं। संस्कृति सामूहिक होती है। यह सभी लोगों को आनंद से आच्छादित करती है। ज्ञान के तमाम स्रोत हैं। मनुष्य अपने भाव अनुभूति से भी ज्ञान पाते हैं। यह ज्ञान गीत सृजन में प्रकट होता है। गीतों की उम्र दीर्घकालिक होती है। इनका प्रभाव भी दीर्घकालिक होता है। अश्लील के प्रभाव की उम्र अल्पकालिक होती है। यह समाज के लिए क्षतिकारी भी है। मर्यादा अनिवार्य है।

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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