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मौतें मेरे घर में हुई है: मेरा भी दर्द उतना है जितना उनके परिजनों का : विजयवर्गीय

January 03, 2026

बहुत आसान होता है शब्दों पर जाना… मुश्किल है दिल में झांक पाना…

मौतें (Deaths) मेरे घर में हुई हैं…विलाप मेरा उतना ही है, जितना उन परिजनों का। आक्रोश मेरा भी उतना है, जितना इस शहर का…फर्क सिर्फ इतना है कि मैं स्वयं पर आक्रोशित हूं। मेरे अपने लोगों की पानी की जरूरत उनकी जान पर बन आई है। यह कहना है क्षेत्रीय विधायक (MLA) और नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय (Kailash Vijayvargiya) का… शब्दों पर मचे बवाल पर उन्होंने कहा बहुत आसान होता है शब्दों पर जाना, लेकिन मुश्किल होता है दिलों में झांक पाना…


नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के अपने गृहनगर में अपने ही विधानसभा क्षेत्र में विषैले पानी से हुई मौतों पर हुए बवाल के बाद विजयवर्गीय ने कहा कि वो मेरा इलाका नहीं, बल्कि वहां का हर घर मेरा घर है और उन घरों का दर्द मेरा अपना दर्द है। मैं उस विलाप का हिस्सा हूं, जिसका दर्द उन घरों के परिजनों के दिलों में है… मुझे उन्होंने जिताया नहीं है, अपना बनाया है, इसीलिए मौत मेरे घरों में हुई है…जब से इस घटना की खबर आई, तब से मैं सो नहीं पाया या यूं कहें कि मुझे नींद ही नहीं आई। मंत्री होने के नाते जिम्मेदारी पर विजयवर्गीय ने कहा कि मैं पहले ही इसकी जिम्मेदारी ले चुका हूं…हालांकि जैसे ही क्षेत्रीय पार्षद ने मुझे शिकायत की, वैसे ही हमने निगमायुक्त सहित अधिकारियों को चेताया, लेकिन उनकी अचेतन स्थिति से इतना बड़ा हादसा हो गया। अधिकारियों द्वारा नहीं सुने जाने पर उन्होंने कहा कि जब यह बात मैंने सार्वजनिक रूप से कही तो इसका मजाक उड़ाया गया। यह बात महापौर भी मुख्यमंत्री से कर चुके हैं। अधिकारियों का जनप्रतिनिधियों से तालमेल होना चाहिए, क्योंकि जनता अपने प्रतिनिधि के पास आती है। अधिकारी कमरों में रहते हैं और उनके पास शिकायतें सुनने-समझने का वक्त और समझ नहीं होती है। लोकतंत्र में इसीलिए जनता अपने प्रतिनिधि को चुनती है, लेकिन जब जनप्रतिनिधि और अधिकारियों का तालमेल टूट जाता है तो ऐसी परिस्थितियां निर्मित होती हैं। एक पत्रकार के प्रश्न के जवाब पर मचे बवाल के बारे में पूछे जाने पर विजयवर्गीय ने भावुक होकर जवाब देते हुए कहा कि बहुत आसान होता है शब्दों पर जाना, लेकिन मुश्किल होता है दिलों में झांक पाना। उन्होंने कहा कि पत्रकार का पहला प्रश्न था कि पीडि़तों को मुआवजा नहीं बंट पा रहा है। इस पर मेरे जेहन में प्राथमिकता अस्पताल में बीमार लोगों के इलाज की थी। जो हादसा हो चुका है, उस पर नियंत्रण की थी। बीमारों का इलाज हो पाए, उन्हें अच्छे से अच्छा इलाज मिल पाए, उन्हें पैसों की दिक्कत न आए, इसीलिए बिना मुख्यमंत्री से पूछे हमने सरकारी ही नहीं प्राइवेट अस्पतालों को भी संदेश भिजवा दिया था कि वो बिना पैसे मांगे इलाज करें, पैसे हम देंगे। ऐसे में मुआवजे का प्रश्न बेजा लगा। दूसरा सवाल करते हुए पत्रकार ने कहा कि वो अस्पतालों में होकर आए हैं। तब मेरे जेहन में हर उस अस्पताल की स्थिति थी, जहां इलाज हो रहा था। हमने वर्मा अस्पताल सहित सभी क्षेत्रीय अस्पतालों में चक्कर लगाए। एमवाय में अधिकारी लगाए। अरबिंदो में 100 बिस्तर जुटाए। ऐसे में एक अस्पताल में जाकर स्थिति का आकलन मन को झंझोड़ गया और जो शब्द निकल गया, उसके लिए मैं खेद प्रकट कर चुका हूं। पर हकीकत यह है कि बहुत आसान होता है शब्दों पर जाना, लेकिनमुश्किल होता है दिलों में झांक पाना…यह एक ऐसा वक्त था, जो मेरे जीवन में कभी नहीं आया…मेरा काम ही मेरी पहचान है, लेकिन जब काम और पहचान दोनों ही सवाल बन जाएं तो मन में ही बवाल उठने लगता है… दरअसल हम इस क्षेत्र की दूसरी मुश्किलों को सुलझाने और समेटने में लगे रहे… क्षेत्र में पानी की समस्या भी हमारे एजेंडा में रही, लेकिन उसके लिए हम पानी की टंकियां बनाते रहे, लेकिन हमारी टंकियों का पानी पाइप लाइनों में जहर बन गया…उन्होंने कहा- हम विचलित हैं, निराश हैं, लेकिन संघर्षशील हैं। इन परिस्थितियों को परिवर्तित कर फिर लोगों के जेहन में विश्वास बनाएंगे।

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