
सच यही है…यदि दिल्ली (Delhi) में गलती से विस्फोटक (explosives) नहीं फट गया होता तो देश में जगह-जगह एक साथ धमाके होते… रॉकेट और ड्रोन (Rockets and drones) से हमले किए जाते… सडक़ें युद्ध का मैदान बन जातीं… सैकड़ों निर्दोषों की जान जाती… कई घर उजड़ जाते… कइयों के अंग-भंग हो जाते और हम मातम के साथ आक्रोश में डूबे नजर आते… फिर पाकिस्तान पर खीझ निकालते… आपरेशन सिंदूर की हुंकार लगाते… देश में युद्ध का माहौल बनाते… वो तो दिल्ली में मारे गए लोगों की कुर्बानी ने देश को बचा लिया, वरना हमारी कुंभकर्णी खुफिया एजेंसियों के खर्राटों ने तो कोई कसर नहीं छोड़़ी थी… सैकड़ों किलो विस्फोटक जमा हो गया… घटना के 24 घंटे पहले फरीदाबाद से पकड़ा भी गया, फिर भी खुफिया मुर्दानगी देखिए आतंक का इतना बड़ा षड्यंत्र पकड़ा नहीं जा सका… देश ब्रह्मास्त्र मिसाइल की ताकत दिखाता है… दूसरे देशों के हमलों से बचने के लिए एस-400 का सुरक्षा कवच लगाता है… मिग विमानों की कतारें सजाई जाती हैं… लाखों-करोड़ के रॉफेल खरीदे जाते हैं, लेकिन हम आंतरिक सुरक्षा को लेकर सतर्क नहीं हो पाते हैं… यह साजिश तो उस वक्त से तय थी, जब हमने आपरेशन सिंदूर में जैश के अड््डे को तबाह कर मसूद अजहर के पूरे परिवार का खात्मा कर डाला था… वर्षों से अपने आतंक का दबदबा बनाने वाले संगठन के मुखिया को खून के आंसू रुलाने के बाद खामोशी तो हो नहीं सकती थी…उसकी खौफनाक साजिशें और खतरनाक मंसूबों का षड्यंत्र तय था…फिर भी हमारी खुफिया निगाहें आंखें फेरे रहीं… हम नक्सली ढूंढकर मारते रहे और आतंक पालते रहे… हम चौराहों पर चालान बनाते रहे और वो विस्फोटकों से भरी कार दिल्ली में घुमाते रहे… हम विकास के गीत गाते रहे और वो आतंकी डॉक्टर बनाते रहे… हमें समझना चाहिए कि जिस देश में पढ़े-लिखे लोग पागल हो सकते हैं… मात्र 20 लाख रुपए में इतना बड़ा षड्यंत्र रच सकते हैं… मजहब के नाम पर बरगलाए और जन्नत की हुरों के लिए ललचाए लोग मौत कबूल कर जहन्नुम जाने को तैयार रहते हैं, वहां जैश जैसे संगठन के आतंकी कौडिय़ों में आतंक परोस सकते हैं…हमारी नाकामी इस बात को लेकर भी नहीं है कि हम सुस्त हैं…हमारी नाकामी इस बात को लेकर है कि जब एक दिन पहले विस्फोटक बरामद होता है तो दूसरे दिन भी हम सतर्क नहीं होते हैं…जब इतना बड़ा असलाह जमा होता रहता है, तब भी हम सतर्क नहीं होते…जब आतंक घाटी से निकलकर दूसरे शहरों में पलता-बढ़ता है, तब भी हम सतर्क नहीं होते हैं… आश्चर्य तो इस बात का है कि हम नए-नए हथियारों की ईजाद करने के लिए रक्षा अनुसंधान बनाते हैं और वो नेट पर ही बैठकर रॉकेटी और ड्रोन हवाई हमलों की तकनीक ईजाद कर जाते हैं…सीमाओं की लड़ाई, सरहदों की सुरक्षा तो आसान है, लेकिन घर की गद््दारी, आतंक की बीमारी, अपनों की अय्यारी से सतर्कता जरूरी है… उसके लिए आंतरिक सुरक्षा रॉफेल से ज्यादा मजबूत होना चाहिए…मिसाइल की तरह सतर्क रहना चाहिए और देश के लोगों को देश का कवच बनकर रहना चाहिए…
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