
नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव (Military Tension)अब लंबा खिंचता नजर आ रहा है। वॉशिंगटन (Washington)स्थित व्हाइट हाउस (the White House) में दिए बयान में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) ने संकेत दिए कि यह संघर्ष जल्द खत्म होने वाला नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अमेरिका का मकसद सिर्फ तत्काल जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि ऐसा स्थायी समाधान है जिससे भविष्य में परमाणु खतरे (Nuclear Threats)की संभावना पूरी तरह खत्म हो सके।
ट्रंप ने अपने बयान में तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि दुनिया को “पागल लोगों” के हाथों में परमाणु हथियार नहीं सौंपे जा सकते। उनका कहना था कि अमेरिका किसी भी कीमत पर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ईरान कभी परमाणु शक्ति न बन सके। उन्होंने यह भी दावा किया कि मौजूदा सैन्य कार्रवाई के बिना ईरान बहुत जल्द परमाणु हथियार हासिल कर सकता था।
यह संघर्ष 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत तेज हुआ, जिसमें इज़रायल ने भी अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ कार्रवाई की। अब यह ऑपरेशन अपने तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती जा रही है।
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका चाहे तो अभी पीछे हट सकता है, लेकिन अब तक हुए नुकसान की भरपाई में ईरान को कई साल लग सकते हैं। इसके बावजूद उन्होंने संकेत दिए कि अमेरिकी प्रशासन जल्दबाजी में पीछे हटने के मूड में नहीं है। उनका मानना है कि अगर इस समय निर्णायक कदम नहीं उठाया गया, तो आने वाले समय में हालात और गंभीर हो सकते हैं और अगली सरकारों को भी इसी संकट का सामना करना पड़ेगा।
उन्होंने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि खुफिया आकलनों के मुताबिक ईरान परमाणु हथियार हासिल करने से “सिर्फ दो हफ्ते दूर” था। ट्रंप के अनुसार, उस स्थिति में कूटनीतिक बातचीत का कोई असर नहीं होता और जोखिम बेहद बढ़ जाता। यही वजह है कि सैन्य विकल्प को चुना गया।
हालांकि, इस बीच ट्रंप प्रशासन को अंदरूनी झटका भी लगा है। नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर (NCTC) के प्रमुख जोसेफ केंट ने ईरान पर हमले के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने त्यागपत्र में इस युद्ध के औचित्य पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि अमेरिका पर ईरान की ओर से कोई “आसन्न खतरा” नहीं था, जिसके कारण युद्ध जरूरी हो।
केंट ने यह भी आरोप लगाया कि यह संघर्ष बाहरी दबावों, खासकर इज़रायल और उसके प्रभावशाली लॉबी समूहों के कारण शुरू हुआ। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वह अपनी अंतरात्मा के खिलाफ जाकर इस युद्ध का समर्थन नहीं कर सकते।
इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि जहां एक ओर अमेरिकी नेतृत्व ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है, वहीं अंदरूनी स्तर पर इस नीति को लेकर मतभेद भी उभर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह संघर्ष किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या वाकई इसका कोई स्थायी समाधान निकल पाता है।
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