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भारत की तरक्की का नया इंजन बना DRDO, ऐसे बदली देश की तस्वीर

September 16, 2025

नई दिल्ली: अब रक्षा तकनीक (Defense technology) का मतलब सिर्फ हथियार या मिसाइलें नहीं रह गया. ये अब रोज़गार देने वाला, तकनीक बढ़ाने वाला और देश को कमाई दिलाने वाला बड़ा साधन बन चुका है. जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इस साल भारत ने रिकॉर्ड ₹23,622 करोड़ के हथियार विदेशों में बेचे, तो ये सिर्फ एक आंकड़ा नहीं था, ये देश की बदलती ताकत की पहचान है. इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भारत के बनाए हथियार दुनिया के कई देशों में इस्तेमाल हो रहे हैं और ये मुमकिन हो पाया है भारत की रक्षा अनुसंधान संस्था DRDO की मेहनत से. DRDO की वजह से ही आज भारत न सिर्फ अपनी जरूरतें खुद पूरी कर रहा है, बल्कि दूसरों की भी मदद कर रहा है.

दुनिया में अमेरिका, फ्रांस और इजराइल जैसे देश पहले से जानते हैं कि रक्षा तकनीक में निवेश करने से सिर्फ सेना मजबूत नहीं होती, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी चलती है. अमेरिका में लाखों लोग सिर्फ रक्षा फैक्ट्रियों में काम करते हैं. इजराइल जैसे छोटे देश ने मिसाइलें और ड्रोन बनाकर साल 2024 में करीब ₹1 लाख करोड़ का सामान बेचा. यही रास्ता अब भारत ने पकड़ा है लेकिन अपने अंदाज़ में. रिपोर्ट के मुताबिक, DRDO ने ब्रह्मोस मिसाइल बनाई, जो अब फिलीपींस को भी भेजी जा रही है. पिनाका रॉकेट सिस्टम और आकाश मिसाइल भी अब भारत से बाहर जा रहे हैं. ये सिर्फ तकनीकी जीत नहीं है, बल्कि दुनिया में भरोसे का एक मजबूत संदेश है कि भारत जो बनाता है, वह चलकर दिखाता भी है.


  • DRDO की सबसे बड़ी ताकत है कि वो सिर्फ बड़े-बड़े सिस्टम नहीं बनाता, बल्कि उसके बनाए कई छोटे-छोटे हिस्से देश की छोटी कंपनियों को भी काम दे रहे हैं. जैसे मिसाइल में लगने वाले सेंसर, रडार, कंपोजिट बॉडी, वायरलेस सिस्टम, ये सब अब देश के कई शहरों में छोटे उद्योगों में बन रहे हैं. इससे हजारों इंजीनियर, तकनीशियन और मज़दूरों को काम मिल रहा है.और बात सिर्फ मशीनों की नहीं है. विदेशों को हथियार भेजने के साथ-साथ भारत अब उन देशों को ट्रेनिंग भी देता है, सिस्टम की मरम्मत करता है और दस्तावेज़ भी तैयार करता है. यानी एक बार मिसाइल बिक गई, तो उसके बाद भी सालों तक काम मिलता रहता है.

    रिपोर्ट के मुताबिक, DRDO की ताकत को अब और मज़बूत करने की ज़रूरत है. कई बार सिस्टम बन जाता है लेकिन सरकारी ऑर्डर में देरी हो जाती है. इससे छोटे उद्योगों को नुकसान होता है. इसलिए ज़रूरी है कि जो तकनीक बन रही है, उसे जल्द से जल्द फैक्ट्रियों तक पहुंचाया जाए. दुनिया के देश तभी खरीदेंगे, जब भारत सही समय पर डिलीवरी करेगा और समय-समय पर नए वर्ज़न भी बनाएगा. जैसे इजराइल ने अपने मिसाइल सिस्टम को हर साल बेहतर किया, वैसे ही भारत को भी करना होगा. एक और बड़ी ज़रूरत है, हुनरमंद लोग. मशीनें तभी बनेंगी जब लोग उन्हें बनाना जानेंगे. इसके लिए रक्षा सेक्टर को कॉलेजों और तकनीकी संस्थानों से जोड़ना होगा, ताकि नई पीढ़ी तैयार हो.

    जब भारत फिलीपींस को ब्रह्मोस भेजता है, या आर्मेनिया को पिनाका, तो ये सिर्फ व्यापार नहीं होता ये भरोसे का सौदा होता है. इससे भारत की छवि बनती है कि हम तकनीक में किसी से कम नहीं हैं. DRDO के अध्यक्ष समीर कामत ने कहा है कि भारत आने वाले 4 साल में ₹50,000 करोड़ के रक्षा उत्पाद विदेशों को बेचेगा. यानी न सिर्फ हथियार बनेंगे, बल्कि कारखानों में गूंजते हथौड़े और मशीनों की आवाज़ देश की आर्थिक रफ्तार भी तय करेंगे. अब हर मिसाइल, हर रडार और हर सिस्टम सिर्फ फौज की ज़रूरत नहीं, बल्कि देश की तरक्की की कहानी बन चुका है.

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