
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बिहार (Bihar) में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) विवाद को मुख्य रूप से विश्वास की कमी का मुद्दा करार दिया। चुनाव आयोग (Election Commission) ने दावा किया कि 7.9 करोड़ मतदाताओं (Voters) में से लगभग 6.5 करोड़ लोगों को कोई दस्तावेज जमा नहीं करना पड़ा, क्योंकि वे या उनके माता-पिता 2003 की मतदाता सूची में शामिल थे। एससी बिहार में चुनाव आयोग के मतदाता सूची संशोधन अभ्यास के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
चुनाव आयोग की ओर से सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने तर्क रखे। सुनवाई के दौरान द्विवेदी ने कहा कि हम शुद्धिकरण अभियान चला रहे हैं। इसे रोकने की कोशिश करने के बजाय, हमारी मदद करें। द्विवेदी ने कहा कि यह एक ड्राफ्ट रोल है। हमने नोटिस दिया है कि कृपया अपनी आपत्तियां और सुधार आवेदन जमा करें। फिलहाल कुछ दोष होना स्वाभाविक बात है।
विश्वास की कमी का मामला: एससी
जस्टिस सूर्यकांत और जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह मुख्य रूप से विश्वास की कमी का मामला प्रतीत होता है और कुछ नहीं। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से आयोग के 24 जून के फैसले को चुनौती देने पर सवाल उठाया, जिसमें दावा किया गया था कि यह अभ्यास एक करोड़ मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर देगा।
कबिल सिब्बल ने तर्क दिया कि आधार, राशन और ईपीआईसी कार्ड होने के बावजूद अधिकारियों ने इन दस्तावेजों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। एससी की पीठ ने कहा, ‘क्या आपका तर्क यह है कि जिन लोगों के पास कोई दस्तावेज नहीं हैं, लेकिन वे बिहार में हैं, उन्हें राज्य का मतदाता माना जाए? ऐसा हो सकता है, लेकिन उन्हें कुछ दस्तावेज दिखाने या जमा करने होंगे।’ जब सिब्बल ने कहा कि लोग अपने या अपने माता-पिता के जन्म प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज खोजने में संघर्ष कर रहे हैं, तो न्यायमूर्ति कांत ने कहा, ‘यह बहुत व्यापक बयान है कि बिहार में किसी के पास दस्तावेज नहीं हैं। अगर बिहार में ऐसा होता है तो देश के अन्य हिस्सों में क्या होगा?’
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