
जबलपुर। मध्यप्रदेश में बिजली दरों में हालिया बढ़ोत्तरी को लेकर महाकोशल चेम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने कड़ी चिंता जताई है। चेम्बर ने शासन से विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 108 के तहत हस्तक्षेप कर बिजली दरों को युक्तिसंगत बनाने की अपील की है। संगठन का कहना है कि बिजली आज के समय में एक आवश्यक सेवा है, ऐसे में आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना उचित नहीं है।
कोयले की लागत घटी, फिर भी नहीं मिला लाभ
चेम्बर के अनुसार बिजली उत्पादन में कोयला मुख्य घटक है और हाल ही में कोयले पर लगने वाला 400 रुपये का सरचार्ज समाप्त कर उसे जीएसटी में शामिल कर दिया गया है, जिससे कोयले की कीमत लगभग 250 रुपये प्रति टन कम हुई है। इसके बावजूद उपभोक्ताओं को इसका लाभ नहीं दिया गया, जो कि केंद्र सरकार की मंशा के विपरीत है। प्रधानमंत्री सूर्य योजना के तहत सौर ऊर्जा से बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन हो रहा है। अतिरिक्त उत्पादित बिजली को कंपनियां मात्र 2.15 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीद रही हैं, लेकिन इस सस्ती बिजली का लाभ भी उपभोक्ताओं को नहीं दिया जा रहा है।
अन्य राज्यों में घट रही दरें
चेम्बर ने यह भी बताया कि देश के कई राज्यों में बिजली दरों में कमी की गई है। महाराष्ट्र में 10 प्रतिशत और पंजाब, बिहार, हिमाचल प्रदेश व आंध्रप्रदेश में 5 प्रतिशत तक दरों में कटौती अप्रैल 2026 से लागू की गई है। ऐसे में मध्यप्रदेश में दर बढ़ाना उपभोक्ताओं के हित में नहीं है।
कंपनियों की कमी का भार उपभोक्ताओं पर क्यों?
चेम्बर ने सवाल उठाया कि बिजली कंपनियों के तकनीकी व प्रबंधन संबंधी नुकसान की जिम्मेदारी उपभोक्ताओं पर डालना अनुचित है। कंपनियों को अपने नुकसान पर नियंत्रण करना चाहिए, न कि उसका भार जनता पर डाला जाए। चेम्बर अध्यक्ष रवि गुप्ता, वरिष्ठ उपाध्यक्ष शंकर नागदेव, कनिष्ठ उपाध्यक्ष युवराज जैन गढ़ावाल, मानसेवी मंत्री अखिल मिश्र सहित अन्य पदाधिकारियों ने शासन से मांग की है कि बिजली दरों को कम करने के लिए तत्काल प्रभाव से उचित कदम उठाए जाएं, ताकि आम जनता और उद्योगों को राहत मिल सके।
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