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भारत के इस मित्र देश में बढ़ रहा हिंदी का क्रेज, सिखाने के लिए नए केंद्र खोल रही सरकार

September 15, 2025

नई दिल्‍ली । भारत(India) में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा अब रूस(Russia) में भी लोगों के आकर्षण का केंद्र(center of attraction) बन रही है। सोवियत संघ(Soviet Union) के पतन के तीन दशक के बाद रूस में हिंदी सीखने वाले इच्छुक व्यक्तियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। लोगों की बढ़ती दिलचस्पी के देखते हुए स्थानीय सरकार अब हिंदी भाषा को पढ़ाने वाले संस्थानों की संख्या को बढ़ा रही है। इस मामले पर बात करते हुए रूस के उच्च शिक्षा उपमंत्री कोंस्टेंटिन मोगिलेव्स्की ने कहा कि रूस चाहता है कि उनके ज्यादा से ज्यादा छात्र हिंदी सीखें।


  • रूसी समाचार एजेंसी ताश से बात करते हुए मोगिलेव्स्की ने कहा, “भारत आज दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। ज्यादातर भारतीय आपसी समझ के लिए अंग्रेजी के बजाय हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं। हमें दोनों देशों के बीच में ज्यादा से ज्यादा संपर्क बढ़ाने के लिए हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाएं सीखने की जरूरत है।” मोगिलेव्स्की के मुताबिक क्रेमलिन लगातार रूसी लोगों में हिंदी के प्रति बढ़ती रुचि से परिचित है। इसलिए इस भाषा को पढ़ाने वाले शैक्षणिक संस्थानों की संख्या को लगातार बढ़ाया जा रहा है।

    मोगिलेव्स्की ने कहा. “आज हिंदी सीखने के लिए युवाओं के पास पहले से कहीं ज्यादा अवसर हैं। अकेले में ही अकेले मॉस्को में ही एमजीआईएमओ स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस, आरएसयूएच, मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी का एशियाई और अफ्रीकी अध्ययन संस्थान और मॉस्को स्टेट लिंग्विस्टिक यूनिवर्सिटी हैं। इसके अलावा सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी, कज़ान फ़ेडरल यूनिवर्सिटी और अन्य यूनिवर्सिटिज में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। हिंदी कोर्स में नामांकित छात्रों की संख्या बढ़ रही है,और समूहों की संख्या दो से तीन गुना ज्यादा है।”

    आपको बता दें सोवियत संघ के समय मॉस्को में हिंदी को लेकर क्रेज अपने चरम पर था। स्थानीय सरकार भी हिंदी भाषा को आगे बढ़ाने का प्रयास करती थी। इतना ही नहीं सरकार ने कुछ प्रकाशकों को रूसी लेखकों की पुस्तकों के हिंदी अनुवाद निकालने के लिए भी प्रोत्साहित किया। हालांकि सोवियत संघ के पतन के बाद मॉस्को में हिंदी पढ़ाने वाले सबसे पुराने बोर्डिंग स्कूल को बंद कर दिया गया। इसके अलावा रेडियो मॉस्को ने भी हिंदी के प्रसारण को बंद कर दिया और प्रोग्रेस और रादुगा प्रकाशन समूहों ने हिंदी में किताबें निकालनी बंद कर दी थीं।

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