
इंदौर, राजेश ज्वेल। अफसर नहीं सुनते हैं… यह राग अनेक वर्षों से नेताओं द्वारा अलापा जाता है, जिसमें इंदौर नगर निगम के कर्णधार भी शामिल हैं। बीते 3 वर्षों में जितने भी आयुक्त पदस्थ हुए उनमें से किसी के साथ महापौर और उनकी मंडली की पटरी नहीं बैठी। अभी भागीरथपुरा कांड के चलते मुख्यमंत्री के निर्देश पर कल अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के साथ रेसीडेंसी पर जो हाईलेवल मीटिंग आयोजित की गई उसमें भी निगम के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि दूषित पानी की सप्लाय या उससे जुड़े मुद्दों पर बात करने के बजाय सराफा चौपाटी, बिल्डिंग परमिशन यानी नक्शे मंजूरी, लीज प्रकरणों से लेकर अन्य मामले उठाते रहे और कुछ अफसरों पर उनकी निजी खुन्नस भी साफ नजर आई। यानी इंदौर की जनता यह सच भी जाने कि बंद कमरों में होने वाली बैठकों में उनके जनप्रतिनिधि किन मुद्दों पर अधिक चिंतित रहते हैं।
एक तरफ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जहां पूरी संवेदनशीलता दिखाई और यहां तक कि वे अपने पूर्व के निर्धारित कार्यक्रमों को छोडक़र 31 दिसम्बर की शाम इंदौर पहुंचे और अस्पतालों में जाकर एक-एक भर्ती मरीजों से उन्होंने ना सिर्फ मुलाकात की, बल्कि उनकी पीड़ा को भी जाना और उसके बाद मेडिकल कॉलेज सभागृह में ही अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के साथ चर्चा की, जिसमें मौजूद अपर मुख्य सचिव संजय दुबे को उन्होंने इंदौर में ही रूकने और पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए, जिसके चलते नगरीय प्रशासन और विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री दुबे इंदौर में ही रूके और कल सुबह उन्होंने भागीरथपुरा का सघन निरीक्षण किया, जिसमें निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव सहित अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे, जिसमें श्री दुबे ने इंदौर निगम में नए तीन अधिकारियों की पदस्थापना की बात भी कही, जिनके आदेश संभवत: आज जारी हो जाएंगे।
इसके बाद दोपहर में श्री दुबे ने रेसीडेंसी कोठी पर हाईलेवल मीटिंग बुलाई, जिसमें दोनों मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तुलसीराम सिलावट के अलावा सांसद शंकर लालवानी, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, उनकी परिषद् के सदस्य अभिषेक शर्मा बबलू और पार्षद भी मौजूद रहे। वहीं संभागायुक्त डॉ. सुदाम खाड़े, कलेक्टर शिवम वर्मा, निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव सहित अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे। यह मीटिंग भागीरथपुरा हादसे और उससे जुड़े मामलों को लेकर बुलाई गई थी। मगर महापौर पुष्यमित्र भार्गव सहित उनके सहयोगी इसकी बजाय अन्य मामलों पर अपनी भड़ास निकालते रहे, जिसमें अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया भी निशाने पर रहे और यह भी कहा गया कि वे मिलते ही नहीं हैं और तीन-तीन घंटे मीटिंग के लिए इंतजार करवाते हैं। उसके अलावा सराफा चौपाटी की भी बात कही गई कि उसकी सूची बनाने में भी अफसरों ने नहीं सुनी, तो बिल्डिंग परमिशन, लीज प्रकरणों के साथ ऐसे अन्य मामलों में खुन्नस निकालते नजर आए। जबकि अफसरों का मानना था कि निगम के इन जिम्मेदार नेताओं को इतने बड़े हादसे पर ही बुलाई इस बैठक में अपनी बात करना थी।
मगर वे आपदा में अवसर तलाशते नजर आए और अपने मनपसंद के अधिकारियों की नियुक्ति का भी एक तरह से दबाव डाला, क्योंकि जब यह बात मीटिंग में उठी कि दो-तीन नए अधिकारियों की पदस्थापना शासन स्तर पर की जाएगी, तो इस पर महापौर का जवाब था कि पहले से ही निगम में कई अधिकारी हैं और उनके पास काम भी नहीं हैं। दरअसल, निगम के ये नेता अपने पसंदीदा अधिकारियों को काम दिलवाना चाहते हैं, ताकि उनके मन मुताबिक नक्शे मंजूर हों, लीज के प्रकरण निपटें या भुगतान से लेकर अन्य कामकाज होते रहें। अगर नियम-कायदों का हवाला देकर अफसरों द्वारा फाइलें रोकी जाती हैं तो उसका विरोध इस तरह के मामलों की बैठकों में उठाया जाता है। यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि महापौर पुष्यमित्र भार्गव के साथ एक भी आयुक्त की पटरी आज तक नहीं बैठ सकी। प्रतिभा पाल, उसके बाद आई हर्षिका सिंह और फिर शिवम वर्मा के बाद अब दिलीप कुमार यादव तक अपने तीन साल के कार्यकाल में एक ही राग अलापा जाता रहा है कि अधिकारी उनकी सुनते नहीं।
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