
नई दिल्ली। भारत ने फ्रांस के साथ 114 राफेल लड़ाकू विमानों (Rafale fighter jets) की खरीद के लिए ऐतिहासिक समझौते को मंजूरी दे दी है, जिसे अब तक के सबसे बड़े रक्षा सौदों (defense deals) में से एक माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Defence Minister Rajnath Singh) की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने सशस्त्र बलों की युद्धक तैयारी को मजबूत करने के लिए लगभग 3.60 लाख करोड़ रुपये के सैन्य उपकरणों की पूंजीगत खरीद को हरी झंडी दी है। राफेल विमानों के इस सौदे को ‘मदर ऑफ ऑल डिफेंस डील्स’ कहा जा रहा है।
18 विमान सीधे ‘उड़ान भरने की स्थिति’ में
इस प्रोजेक्ट के तहत फ्रांस की कंपनी Dassault Aviation 18 राफेल विमान सीधे तैयार स्थिति में सप्लाई करेगी। बाकी विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा, जिसमें 50 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी उत्पादन शामिल होगा। यह उत्पादन चरणबद्ध तरीके से पूरा होगा।
लागत और अनुबंध
रक्षा मंत्रालय ने कुल लागत का आधिकारिक खुलासा नहीं किया है, लेकिन अनुमान 2.90 लाख करोड़ रुपये से 3.15 लाख करोड़ रुपये के बीच है। सौदे को अंतिम रूप देने के लिए औपचारिक अनुबंध इस साल के अंत से पहले नहीं होने की संभावना है, क्योंकि हथियारों के पैकेज और अन्य बारीकियों पर Dassault Aviation के साथ बातचीत बाकी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) को भी इसे अंतिम मंजूरी देनी होगी। अप्रैल 2019 में भारतीय वायुसेना ने लगभग 18 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत से 114 बहु-उद्देश्यीय लड़ाकू विमान (MRFA) खरीदने के लिए आरएफआई जारी किया था। इस परियोजना में लॉकहीड मार्टिन का F-21, बोइंग का F/A-18 और यूरोफाइटर टाइफून भी दावेदार थे।
वायुसेना में स्क्वाड्रन की कमी
इस बड़े सौदे का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन आधिकारिक संख्या 42 से घटकर 31 रह गए हैं। लगभग 13 साल पहले एमएमआरसीए परियोजना तैयार की गई थी, लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पाई। 2015 में मोदी सरकार ने 36 राफेल विमान खरीदने की घोषणा की थी, और आज वायुसेना इन विमानों का संचालन कर रही है।
मिसाइलें भी भारत में बनेंगी
रक्षा मंत्रालय ने कहा कि खरीदी जाने वाली अधिकांश MRFA मिसाइलें भारत में ही निर्मित होंगी। इनसे लंबी दूरी के आक्रामक हमलों और हवाई वर्चस्व स्थापित करने की क्षमता में वृद्धि होगी। AS-HAPS सिस्टम खुफिया, निगरानी, टोही और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
नौसेना और बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भरता
भारतीय नौसेना को चार मेगावाट के समुद्री गैस टरबाइन आधारित विद्युत जनरेटर और P-8I लंबी दूरी के समुद्री टोही विमान के अधिग्रहण की मंजूरी मिली है। इससे नौसेना की पनडुब्बी-रोधी युद्ध क्षमता, समुद्री निगरानी और हमले की क्षमता बढ़ेगी और विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम होगी।
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