
नई दिल्ली। देश में मुकदमों (Case) के बढ़ते बोझ के बीच जिला अदालतों (District court) में न्यायाधीशों (Judges) की संख्या बेहद कम है। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय (Union Ministry of Law and Justice) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर केवल 22 जज हैं, जबकि 2007 तक यह संख्या 50 होनी चाहिए थी। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में यह औसत राष्ट्रीय स्तर से भी कम है।
केंद्रीय आंकड़ों के अनुसार, देशभर की जिला अदालतों के लिए कुल 25,439 जजों की स्वीकृत संख्या है, लेकिन करीब 5 हजार पद खाली हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक यह औसत 22 था, और वर्तमान में देश की आबादी बढ़कर 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिससे वास्तविक अनुपात और भी कम हो सकता है।
विधि आयोग ने 1987 में अपनी 120वीं रिपोर्ट में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 50 जज होने की सिफारिश की थी, ताकि मुकदमों का बोझ कम हो और जनता को त्वरित न्याय मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में इस सिफारिश को लागू करने का आदेश दिया था, लेकिन आज तक यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया।
अंतरराष्ट्रीय तुलना
भारत में जजों का अनुपात चीन, अमेरिका और यूरोपीय देशों के मुकाबले काफी कम है। चीन में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 300 जज हैं, अमेरिका में 150 और यूरोपीय देशों में 220 जज हैं।
सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय
सुप्रीम कोर्ट में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 0.028 जज हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में यह 0.92 है। सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों की स्वीकृत संख्या में फिलहाल 33 कार्यरत हैं। उच्च न्यायालयों में 1122 की स्वीकृत संख्या में लगभग 300 पद खाली हैं।
प्रमुख राज्यों में स्थिति (प्रति 10 लाख जनसंख्या)
बिहार: 19.45
उत्तर प्रदेश: 18.52
झारखंड: 21.43
उत्तराखंड: 29.55
दिल्ली: 53.43
पश्चिम बंगाल: 12.05
मध्य प्रदेश: 27.92
गुजरात: 28.46
असम: 15.54
मिजोरम: 67.44
यह आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत में न्यायिक प्रणाली को मजबूत करने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति और संख्या बढ़ाने की सख्त जरूरत है।
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