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बांग्लादेश चुनाव पर भारत की पैनी नजर, BNP या जमात? नई सरकार से रिश्तों की दिशा तय

February 12, 2026

नई दिल्ली । पूर्वी पड़ोसी बांग्लादेश(Bangladesh) में 12 फरवरी को होने जा रहा आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया(South Asia) की भू-राजनीति(Geopolitics) की दिशा तय करने वाला अहम मोड़ भी साबित हो सकता है। इस बार चुनाव के साथ जनमत संग्रह(Referendum) भी कराया जा रहा है, जिसके चलते मतदाता दो वोट डालेंगे एक नई सरकार चुनने के लिए और दूसरा जनमत संग्रह के सवाल पर। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि नतीजे इस्लामवादी दलों की ओर झुक सकते हैं, जिससे भारत की रणनीतिक चिंताएं (Strategic concerns)बढ़ना स्वाभाविक है।

अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के नाटकीय पतन के बाद बांग्लादेश लगातार राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा है। सड़कों पर प्रदर्शन, नौकरशाही में फेरबदल, मजदूर हड़तालें और हिंसा ने माहौल को अनिश्चित बना दिया है। भारत के लिए यह स्थिति संवेदनशील है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ उसकी 4,000 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा है और सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी व पूर्वोत्तर की स्थिरता सीधे तौर पर ढाका की राजनीति से जुड़ी है।

इस चुनाव में अवामी लीग की अनुपस्थिति ने मुकाबले को मुख्य रूप से तीन संभावनाओं तक सीमित कर दिया है बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार, बीएनपी-जमात गठबंधन, या जमात के प्रभुत्व वाला शासन। सर्वेक्षणों में बीएनपी को बढ़त दिखाई गई है। इनोविजन कंसल्टिंग के आंकड़ों के अनुसार बीएनपी को 52.8 प्रतिशत वोट शेयर मिल सकता है, जबकि नैरेटिव/आईआईएलडी सर्वे इस अंतर को बेहद कम बताते हैं। असली निर्णायक भूमिका अवामी लीग के पारंपरिक मतदाताओं की होगी।

भारत के रणनीतिक हलकों में यह आकलन है कि बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान के साथ काम करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। हालांकि अतीत में बीएनपी सरकारों पर पाकिस्तान समर्थक रुख और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद को हवा देने के आरोप लगे थे, फिर भी उसे एक व्यावहारिक, मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी दल माना जाता है। भारत के लिए प्राथमिकता स्थिरता और संस्थागत निरंतरता है।

दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी के उदय को लेकर नई दिल्ली में अधिक सतर्कता है। जमात के कुछ नेताओं के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से कथित संबंध, चीन के साथ बढ़ते संपर्क और सिलहट जैसे हवाई अड्डों तक चीन की संभावित पहुंच जैसे मुद्दे भारत के लिए रणनीतिक चिंता का कारण हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जमात ने हालिया उथल-पुथल के दौरान प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी पकड़ मजबूत की है, जो चुनावी लाभ में बदल सकती है।

भारत के लिए तिहरा संकट की आशंका यहीं से जन्म लेती हैपहला, सीमापार उग्रवाद और कट्टरपंथ का पुनरुत्थान; दूसरा, पाकिस्तान के साथ संभावित रणनीतिक समीकरण और तीसरा, चीन की बढ़ती भू-राजनीतिक पैठ। 1990 और 2000 के दशक की घटनाएं जब भारत के पूर्वोत्तर में उग्रवाद को लेकर ढाका पर आरोप लगे थे, अब भी नीति-निर्माताओं की स्मृति में ताजा हैं।


  • इसके बावजूद भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से व्यवहारिक रही है। नई दिल्ली ने ढाका में हर तरह की सरकार के साथ काम किया है और आगे भी यही दृष्टिकोण रहने की संभावना है। फिलहाल भारत के लिए सबसे अहम बात एक निर्वाचित और अपेक्षाकृत स्थिर सरकार का गठन है, क्योंकि लंबे समय तक अनिश्चित या विवादित अंतरिम व्यवस्था सीमा पार अस्थिरता को जन्म दे सकती है।

    बांग्लादेश का यह चुनाव केवल ढाका की सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि भारत बांग्लादेश संबंध सहयोग और स्थिरता की राह पर आगे बढ़ेंगे या नई चुनौतियों का सामना करेंगे।

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