
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि देशभर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में (In all Government and Private Schools across the Country) छात्राओं के लिए अलग शौचालय और मुफ्त सैनिटरी पैड देना अनिवार्य होगा (It is mandatory to provide Separate Toilets and Free Sanitary Pads to Girl Students) ।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देशभर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को लेकर एक अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि प्रत्येक स्कूल में कक्षा 6 से 12वीं तक की छात्राओं के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था की जाए और उन्हें मुफ्त में सैनिटरी पैड अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराए जाएं । सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि छात्राओं का अधिकार है कि उन्हें सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक माहौल मिले। सुप्रीम कोर्ट ने सभी स्कूलों में ‘मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर’ बनाने का निर्देश दिया है। इन कॉर्नर में मासिक धर्म से जुड़ी सभी जरूरी चीजें और जानकारी उपलब्ध कराई जाएंगी ताकि छात्राएं खुद को सुरक्षित और जागरूक महसूस कर सकें।

अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दें और बताएं कि इस फैसले को जमीन पर कैसे लागू किया गया है। साथ ही, कोर्ट ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय स्तर पर एक नीति बनाने को भी कहा है ताकि देशभर में एक समान व्यवस्था लागू हो सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो स्कूल इन निर्देशों का पालन नहीं करेंगे, उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भी निर्देश दिया है कि हर स्कूल में दिव्यांग-अनुकूल (डिसेबल-फ्रेंडली) शौचालय बनाए जाएं, ताकि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को भी किसी तरह की असुविधा न हो। यह आदेश वर्ष 2024 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया है। यह याचिका जया ठाकुर द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू किया जाए। कोर्ट ने माना कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी लड़कियों की शिक्षा और गरिमा दोनों को प्रभावित करती है।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश केवल कानूनी या प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि उन कक्षाओं से भी जुड़ा है जहां कई बार लड़कियां अपनी जरूरतों के बारे में खुलकर बात नहीं कर पातीं। यह उन शिक्षकों के लिए भी है जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण असहाय महसूस करते हैं, और उन अभिभावकों के लिए भी है जो इस समस्या की गंभीरता को नहीं समझ पाते।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी समाज की प्रगति का पैमाना इस बात से तय होता है कि वह अपने सबसे कमजोर वर्ग की कितनी सुरक्षा और सम्मान करता है। यह फैसला उन सभी बच्चियों के लिए एक मजबूत संदेश है, जिन्हें केवल मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं के कारण स्कूल छोड़ना पड़ता था। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी, संवेदनशील और समान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित होगा।
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