
कोच्चि । केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) ने विवादास्पद नवा केरल सर्वे को रद्द कर दिया (Quashed controversial Nava Kerala Survey) । हाईकोर्ट ने इसे गैरकानूनी करार दिया और इसके वित्तपोषण और क्रियान्वयन पर सवाल उठाए।
यह फैसला विपक्ष के बढ़ते आरोपों के बीच आया है कि नवा केरल सर्वे राजनीतिक रूप से प्रेरित था और इसका उद्देश्य एलडीएफ के चुनावी घोषणापत्र के लिए इनपुट जुटाना था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम के लिए न तो उचित बजट आवंटन किया गया था और न ही वित्तीय मंजूरी दी गई थी। सरकार के स्पष्टीकरणों से असंतोष व्यक्त करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने धन के स्रोत और उपयोग के बारे में गंभीर संदेह व्यक्त किए, हालांकि अदालत ने यह माना कि जनता की जरूरतों को समझने के लिए सर्वेक्षण करने में स्वाभाविक रूप से कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन उसने सवाल उठाया कि क्या यह पहल वास्तव में आधिकारिक आवरण के तहत किया गया एक राजनीतिक अभ्यास था?
इस सर्वेक्षण को कल्याणकारी योजनाओं और विकास पहलों पर प्रतिक्रिया जानने के लिए एक जनसंपर्क प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया था। स्वयंसेवकों की पहचान एक पोर्टल के माध्यम से की गई और पूरे राज्य में घर-घर जाकर उनसे संपर्क किया गया। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि पार्टी कार्यकर्ताओं को तैनात किया जा रहा था और सरकारी तंत्र का दुरुपयोग पक्षपातपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था।
विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे पिनाराई विजयन सरकार के लिए एक स्पष्ट फटकार बताया। वी.डी. सतीशन ने कहा, “बहुमूल्य जनहितकारी उद्देश्यों के लिए लोगों तक पहुंचने में जनता का बहुमूल्य धन खर्च किया जा रहा है। यह सरासर अस्वीकार्य है।” उन्होंने आरोप लगाया कि अन्य विभागों में भी इसी तरह की कवायदें चल रही होंगी।उन्होंने कहा, “हमें अब पता चला है कि वन विभाग के कर्मचारी वन क्षेत्रों के पास स्थित घरों में जाकर सर्वेक्षण शुरू कर रहे हैं। अगर इसे नहीं रोका गया तो हम हस्तक्षेप करेंगे। वन कर्मचारियों का कर्तव्य लोगों और वनों की रक्षा करना है, न कि असंबंधित गतिविधियों में संलग्न होना।”
केरल उच्च न्यायालय का यह आदेश सर्वेक्षण को रोकने की मांग वाली दो याचिकाओं पर आया और सरकार को वित्त पोषण के संबंध में स्पष्ट रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के लिए दिए गए बार-बार के निर्देशों के बाद आया। चुनावों के नजदीक आने के साथ ही इस फैसले ने केरल में राजनीतिक लड़ाई को और तेज कर दिया है, जिससे सरकार रक्षात्मक स्थिति में आ गई है और चुनावों से पहले राज्य संसाधनों के उपयोग पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
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