
इंदौर। भूमाफियाओं के गढ़ इंदौर में एक से बढक़र एक खेल आए दिन उजागर होते रहे हैं, जिसमें हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं और यहां तक कि न्यायिक प्रक्रिया के साथ भी खेला करने से ये जमीनी जादूगर नहीं चूकते। कनाडिय़ा की 200 करोड़ से अधिक की बेशकीमती जमीन पर भी बीते 10 सालों से इसी तरह का फर्जीवाड़ा चल रहा है और आठ एकड़ जमीन को हासिल करने के लिए आधा दर्जन पार्वतीबाई अभी तक कागजों पर बताई जा चुकी हैं। प्राधिकरण की टीपीएस योजना में भी ये जमीन शामिल है और जब राजस्व न्यायालय से भूमाफियाओं को मदद नहीं मिल सकी तो अब कोर्ट का सहारा लिया गया और मूल रजिस्ट्री पेश किए बिना ही समझौता डिक्रियां हासिल कर लीं। अभी हाईकोर्ट में जब कुछ अभिभाषकों ने इस प्रकरण से खुद को अलग करने के आवेदन लगाए तब कोर्ट भी सतर्क हुआ और अब चार हफ्ते में शासन से इस विवादित जमीन को लेकर जवाब मांगा है।
नजूल, मंदिरों से लेकर सरकारी और संस्थाओं की जमीनों को भी हड़पने के लिए कोर्ट की डिक्रियों का सहारा लिया गया, जिनमें से कई डिक्रियों को बाद में शासन-प्रशासन ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ते हुए खारिज भी करवाया और अभी भी पिपलिया कुमार तालाब सहित कई जमीनों के प्रकरण चल रहे हैं। इसी कड़ी में कनाडिय़ा का चर्चित पार्वती बाई से जुड़ा केस भी है, जिसमें अभी तक आधा दर्जन महिलाएं खुद को पार्वती बाई बता चुकी है। कनाडिय़ा की सर्वे नम्बर 44 की 3.025 हेक्टेयर जमीन, जो कि लगभग 8 एकड़ होती है, जिसका बाजार मूल्य वर्तमान में 200 करोड़ रुपए से अधिक है। यह जमीन पूर्व में राजस्व रिकॉर्ड में पार्वती बाई पति ओंकारलाल के नाम पर दर्ज थी और बाद में फिर अन्य महिलाएं भी पार्वती बाई के रूप में इस जमीन को अपना बताती रही। यहां तक कि कुछ जादूगरों ने तो पार्वती बाई को मृत बताकर भी जमीन हड़पने के प्रयास किए।
10 साल पहले तहसीलदार ने 1975 के फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र के आधार पर दावा मंजूर करते हुए 29 मई 2015 को नामांतरण कर दिया था। बाद में राजस्थान से आए प्रकाश और नीलेश पालीवाल सहित अन्य ने तत्कालीन कलेक्टर को शिकायत की, जिसमें बताया कि पार्वती बाई की मृत्यु तो 28 जून 2015 में हो गई थी ना कि 1975 में। नतीजतन इन दस्तावेजों के आधार पर तत्कालीन एसडीओ ने तहसीलदार के नामांतरण आदेश को रद्द कर दिया। और उसके बाद जब राजस्व न्यायालय से जमीन मालिकों को अभी तक कोई राहत नहीं मिल सकी तो कोर्ट का सहारा लेने के प्रयास शुरू हो गए। विभिन्न न्यायालयों के अलावा अभी इंदौर हाईकोर्ट के समक्ष लम्बित प्रकरण में दो पक्षों द्वारा आपस में समझौता पेश कर दिया, जिसके चलते न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होता देख कुछ वकीलों ने अपना नाम इस प्रकरण से वापस लेते हुए न्यायालय के समक्ष कहा कि हम ऐसी साजिश का हिस्सा नहीं बन सकते।
इन वकीलों में शामिल वरिष्ठ अभिभाषक डॉ. विवेक पांडे से जब अग्रिबाण ने चर्चा की तो उन्होंने कहा कि इंदौर बायपास पर फिनिक्स मॉल के पीछे की इस जमीन को हड़पने के प्रयास जब राजस्व न्यायालय से पूरे नहीं हो पाए तो अब भूमाफियाओं ने कोर्ट का रुख करते हुए समझौते की डिक्रियां हासिल कर ली और ऐसा ही प्रयास हाईकोर्ट में द्वितीय अपील 2966/23 में भी किया जा रहा है। श्री पांडे के मुताबिक, इस प्रकरण में एक अन्य पक्ष द्वारा जहां कलेक्टर के समक्ष उक्त जमीन के आबंटन हेतु अपने ट्रस्ट के नाम से आवेदन लगाया, तो एक अन्य पक्ष ने इस संबंध में जनहित याचिका दायर कर रखी है, जिसमें यह मांग की गई कि उक्त जमीन को लावारिस होने के चलते शासन को अधिग्रहित कर लेना चाहिए। हाईकोर्ट ने अभी अपील वापसी के अलग-अलग अंतरिम आवेदन मिलने पर इसे गंभीरता से लिया और न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने स्पष्ट कहा कि मामले में चूंकि राज्य शासन का पर्याप्त और महत्वपूर्ण हित जुड़ा है, इसलिए बिना राज्य का पक्ष सुने कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। लिहाजा चार हफ्ते में शासन दोनों आवेदनों पर अपना जवाब प्रस्तुत करे। उसके बाद ही आगे की सुनवाई होगी।
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