
इंदौर। शासन अपना खजाना भरने के लिए पंजीयन, आबकारी, परिवहन सहित अन्य प्रमुख विभागों के भरोसे रहता है। लाड़ली बहना जैसी योजना के कारण हर माह 1800 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च करना पड़ती है। नतीजतन नई आबकारी नीति पर फिलहाल मंथन जारी है और आगामी वित्त वर्ष में लगभग 3 हजार करोड़ रुपए अधिक कमाने का लक्ष्य भी शराब ठेकों के जरिए रखा है। चालू वित्त वर्ष में 18 हजार करोड़ रुपए की कमाई विभाग को 31 मार्च तक होने का
अनुमान है।
हर साल शराब ठेकों की राशि 10 से 20 फीसदी तक बढ़ जाती है। अभी जो नई आबकारी नीति तैयार की जाती है उसमें भी 20 फीसदी शराब दुकानों की कीमत बढ़ाने का निर्णय लिया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि इस बार समूह की बजाय अलग-अलग दुकानों का ठेका दिया जाएगा, जिससे बड़े ठेकेदारों का एकाधिकार खत्म होगा और अधिक संख्या में ठेकेदारों की नीलामी प्रक्रिया जुडऩे से प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी, जिसके चलते राजस्व आय में भी इजाफा होगा। दरअसल, अभी इंदौर सहित कुछ जिलों में ठेकेदार घाटे के चलते बीच में ही ठेका छोड़ गए, जिसके कारण आबकारी विभाग को तीन माह के लिए अलग से इन दुकानों को ठेके पर देने की प्रक्रिया शुरू करना पड़ी।
वैसे तो वर्तमान शराब दुकानें चला रहे ठेकेदारों को यह विकल्प दिया जाता है कि वे अगर 20 फीसदी अधिक राशि चुकाते हैं तो उन्हें आगामी वित्त वर्ष के लिए भी दुकानें चलाने की अनुमति मिल जाएगी। ई-नीलामी के जरिए इन दुकानों के ठेके आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए दिए जाना है। इंदौर जिले में ही 173 कम्पोजिट शराब दुकानें हैं और गत वर्ष 64 एकल समूहों के साथ वर्तमान लाइसेंसधारियों के आवेदनों का नवीनीकरण किया गया था। लगभग 1800 करोड़ रुपए में शराब दुकानें नीलाम हुई और अब यह ठेका 2000 करोड़ रुपए तक इंदौर जिले का पहुंच जाएगा, जिसमें कई दुकानें तो अत्यधिक महंगी और घाटे वाली भी हो गई है।
मगर इंदौर में शराब ठेका लेना महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसके चलते बड़े ठेकेदार आसपास की दुकानों के साथ -साथ इंदौर में भी अपना ठेका जारी रखते हैं। हालांकि पिछले दिनों अवैध शराब परिवहन के मामले पकड़े गए और शहर के बड़े ठेकेदारों पर भी ऊंगली उठी, लेकिन हर बार पुलिस या आबकारी विभाग अवैध शराब तो पकड़ता है और साथ में गाड़ी भी जब्त होती है, लेकिन ड्राइवर और ट्रांसपोर्टर को ही आरोपी बनाया जाता है और ठेकेदार का पता नहीं चलता।

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