
नई दिल्ली । अमेरिका, ईरान और इज़रायल (Israel) के बीच जारी संघर्ष अब सिर्फ सैन्य मोर्चे (Military Fronts) तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर सीधे अमेरिकी नागरिकों की जेब पर पड़ने लगा है। युद्ध के तीसरे सप्ताह में ऊर्जा बाजार (Energy Market) पर बढ़ते दबाव के कारण अमेरिका में पेट्रोल (petrol) की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है, जिससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है।
हालिया आंकड़ों के मुताबिक, एक महीने पहले जहां पेट्रोल की औसत कीमत 2.94 डॉलर प्रति गैलन थी, वह अब बढ़कर 3.72 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब महंगाई पहले से ही अमेरिकी मतदाताओं के लिए एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। ऐसे में ईंधन की कीमतों में तेजी ट्रंप प्रशासन के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।
व्हाइट हाउस में हाल ही में दिए गए संबोधन में ट्रंप ने युद्ध के साथ-साथ कई घरेलू मुद्दों जैसे केनेडी सेंटर के नवीनीकरण, नए बॉलरूम के निर्माण और आगामी वर्ल्ड कप पर भी विस्तार से बात की। हालांकि, उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह दिखाने की कोशिश की कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन अंदरखाने दबाव बढ़ता नजर आ रहा है।
युद्ध के कारण ट्रंप को अपनी प्रस्तावित चीन यात्रा भी टालनी पड़ी है, जो अप्रैल की शुरुआत में होने वाली थी। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की प्राथमिकता फिलहाल ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को सफल बनाना है। यह कदम इस बात का संकेत है कि प्रशासन इस संघर्ष को लेकर पूरी तरह गंभीर है और इसे जल्दी खत्म होने वाला नहीं मान रहा।
सैन्य स्तर पर भी अमेरिका अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, जापान से लगभग 5,000 सैनिकों और नाविकों वाली मरीन इकाई को मध्य पूर्व भेजा गया है। इस कदम से अमेरिका के पास सैन्य विकल्प तो खुले रहेंगे, लेकिन इससे क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा को लेकर जोखिम भी बढ़ सकता है।
इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव और बढ़ गया है। ईरान की ओर से जहाजों के लिए संभावित खतरे के बीच ट्रंप ने इस अहम समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की अपील की है। उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन जैसे देशों से सहयोग मांगा, लेकिन कई देशों ने इसमें शामिल होने से फिलहाल इनकार कर दिया है, जिससे अमेरिका की कूटनीतिक चुनौती और बढ़ गई है।
घरेलू मोर्चे पर, बढ़ती गैस कीमतें ट्रंप के “अफोर्डेबिलिटी एजेंडा” को कमजोर कर सकती हैं। हालांकि महंगाई दर में कुछ गिरावट आई है, लेकिन आवास, खाद्य पदार्थों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं। ऐसे में पेट्रोल की महंगाई आम लोगों के खर्च को और बढ़ा रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है और ऊर्जा कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं, तो यह ट्रंप के राजनीतिक भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि प्रशासन इस दोहरी चुनौती विदेश नीति और घरेलू अर्थव्यवस्था को किस तरह संतुलित करता है।
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