नई दिल्ली। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) से जुड़े कथित ‘शूटिंग वीडियो’ को लेकर उठा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट (SC) पहुंच गया है। दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग (Najeeb Jung) समेत 12 सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शीर्ष अदालत में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। याचिका में उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं पर नफरत फैलाने और गैर-जिम्मेदाराना बयान देने के आरोप लगाए गए हैं।
याचिका में कहा गया है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा सहित कई वरिष्ठ मंत्री और राज्यपाल लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं, जो मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हैं और संविधान में निहित मूल्यों व मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से इस गंभीर मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग की है।
इस जनहित याचिका को दाखिल करने वालों में नजीब जंग के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता रूप रेखा वर्मा, जॉन दयाल सहित अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की बयानबाज़ी से समाज में नफरत और विभाजन बढ़ रहा है।
याचिका में दावा किया गया है कि हाल के वर्षों में कई उच्च पदस्थ जनप्रतिनिधियों के बयान चिंता का विषय रहे हैं। इसमें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कथित मुस्लिम-विरोधी बयान, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की टिप्पणियाँ और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा विधानसभा में की गई “कठमुल्ला” संबंधी टिप्पणी का ज़िक्र किया गया है।
इसके अलावा, याचिका में महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नितेश राणे द्वारा मुसलमानों को “पाकिस्तानी पिंप्स” कहे जाने और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से जोड़े गए उस बयान का भी उल्लेख है, जिसमें युवाओं से “इतिहास का बदला लेने” की बात कही गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी निगाहें
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस तरह के बयान न केवल अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देते हैं, बल्कि देश की संवैधानिक व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी कमजोर करते हैं। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख और संभावित दिशा-निर्देशों पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
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