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रावी नदी पर शाहपुर कंडी बांध तैयार, जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सूखी जमीन होगी हरी, बूंद-बूंद को तरसेगा पाक

February 17, 2026

कठुआ। भारत (India) और पाकिस्तान (Pakistan) के बीच बहते पानी की सियासत में बड़ा बदलाव सामने आया है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) की सीमा पर स्थित शाहपुर कंडी बांध परियोजना (Shahpur Kandi Dam Project) अपने अंतिम चरण में है। इस बांध के चालू होने के बाद रावी नदी का वह पानी, जो अब तक पाकिस्तान (Pakistan) चला जाता था, अब पूरी तरह भारत के उपयोग में आएगा। इसका पानी मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सूखी भूमि की सिंचाई में लगाया जाएगा। जम्मू-कश्मीर के मंत्री जावेद अहमद राणा ने बताया कि बांध का काम 31 मार्च तक पूरा होने की उम्मीद है। यह परियोजना विशेष रूप से कठुआ और सांबा जिलों के लिए जीवनरेखा साबित होगी।

सिंचाई और आर्थिक विकास में बड़ा योगदान
शाहपुर कंडी बांध न केवल जल संचयन करेगा, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी गति देगा। इससे जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों की 32,173 हेक्टेयर से अधिक भूमि और पंजाब की लगभग 5,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई संभव होगी। केंद्र सरकार ने सिंचाई घटक के लिए 485.38 करोड़ रुपये की सहायता राशि मंजूर की है। बांध के पूरा होने से क्षेत्र में बिजली उत्पादन और कृषि विकास को नई दिशा मिलेगी।


  • सिंधु जल संधि और भारत की नई रणनीति
    1960 की सिंधु जल संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलज जैसी पूर्वी नदियों पर भारत का विशेष अधिकार है। तकनीकी बाधाओं और बांध न होने के कारण अब तक काफी पानी पाकिस्तान चला जाता था। हाल ही में भारत ने पाकिस्तान के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए संधि के तहत डेटा शेयरिंग को रोक दिया है और पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) के अधिकतम उपयोग की संभावनाएं तलाश रहा है। जम्मू-कश्मीर के विधायक डॉ. रामेश्वर सिंह ने कहा कि बांध के चालू होने के बाद पानी अब पाकिस्तान नहीं जाएगा, बल्कि कठुआ क्षेत्र की खेती और हरियाली में लगेगा।

    दशकों का इंतजार और राजनीतिक पहल
    2001: परियोजना को पहली बार मंजूरी मिली, लेकिन अंतर्राज्यीय विवादों के कारण काम रुका।
    2018: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप के बाद पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच समझौता हुआ।
    वर्तमान: परियोजना मिशन मोड में है, ताकि पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी को रोका जा सके।

    अधिकारियों का कहना है कि यह कदम न केवल कृषि के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि सीमा पार आतंकवाद और कूटनीतिक दबाव के दृष्टिकोण से भी रणनीतिक महत्व रखता है। पाकिस्तान पहले से ही जल संकट से जूझ रहा है, और भारत द्वारा अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग इस संकट को और बढ़ा सकता है।

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