
गंगा (Ganges) को स्वर्ग से धरती (heaven to earth) पर लाने का प्रयास जिस भागीरथ (Bhagirath) ने किया, उनके नाम पर बसे भागीरथपुरा की गंगा गटर (gutter) में बदल गई और मौत का इतिहास लिख गई… आज भागीरथपुरा के कई घरों में मौत है, मातम है… आंसू है, विलाप है, आक्रोश है, आग है, शब्दों के बाण हैं और घायल मन के दर्द से भरा मानस हैं… लेकिन यह आग और आक्रोश, यह दर्द और मातम न तो मौत को जिंदगी में बदल सकता है और न ही इस सच को छुपा सकता है कि वो फिर आएगी… मौत कहीं नहीं जाएगी… बीमारी मिट नहीं पाएगी, क्योंकि इस शहर में 50 सालों से भी पुरानी सड़ी-गली पाइप लाइनें हैं, जो अपनी उम्र खो चुकी हैं… हमने उनकी मौत पर आंसू नहीं बहाए, इसीलिए आज अपनों की मौत पर मातम मना रहे हैं… जर्जर हो चुकी, जीवन खो चुकी पाइप लाइनें कभी यहां से फूटती हैं तो कभी वहां फटती हैं… कभी कीचड़ पानी में मिलता है, कभी गटर का पानी पीना पड़ता है… यह हर गली, मोहल्ले की कहानी है… हर इलाके की रुसवाई है… हम तत्काल निजात पाने के लिए चीखते-चिल्लाते हैं… हफ्ते-दो हफ्ते में वो जागते हैं… कुछ न कुछ जुगाड़ कर वो जब तक कीचड़ और गटर का इलाज कर पाते हैं तब तक हम अड़ोस-पड़ोस का पानी पीकर दिन गुजारते हैं… पता नहीं इस बार न हम चीखे न चिल्लाए…न वो उठे न जाग पाए… इस बार तो हमने भी हद कर दी… जुगाड़ से तौबा कर गटर को गले की गंगा बना लिया और अपनों को मौत के करीब ला दिया… न हमने उन्हें समझाया न उन्हें जगाया… पूरे शहर की इस आफत का इलाज पानी की नई पाइप लाइनें बिछाने से ही हो पाएगा, लेकिन वो पुराने अधिकारियों को जिम्मेदार बताकर हटाएंगे… नए ले आएंगे… अब पता नहीं वो नई फूटी पाइप लाइन में कहां-कहां थेगले लगाएंगे, क्योंकि हमारी सरकार तो कंगाल है… नई पाइप लाइन के लिए 50 हजार करोड़ चाहिए और पांच-सात साल का वक्त… न हमारे पास वक्त है और न उनके पास पैसा… इसीलिए आज मौत यहां आई है, कल कहीं और आएगी…और मौत नहीं आएगी तो मरने जैसी बीमारी दे जाएगी… आंतें कमजोर हो जाएंगी… लिवर फेल हो जाएगा… पेट जवाब दे जाएगा… बीमारियां घर-घर आएगी… हर दिन अस्पताल और डॉक्टरों के चक्कर लगाएंगे, फिर पानी की मौत मारे जाएंगे… हम नेताओं पर गुर्राएंगे और सही भी है, क्योंकि उन्होंने समय पर फूटी पाइप लाइन पर थेगला नहीं लगवाया… नेता तो इस बात पर सिर पीट रहे हैं कि उन्होंने जनता की सुविधा के लिए सुविधाघर ही क्यों बनवाया, जो उसका मल-मूत्र पानी में मिलकर आया… अब वो सिर पीटें या हम छाती पीटें, लेकिन एक बात के लिए तैयार रहें कि हम पानी उसी तरह सूंघकर पिएंगे, जिस तरह मुख्य सचिव ने दौरे पर आकर सूंघा और आज कलेक्टर ने भी सूंघा… बदबू आए तो जुगाड़ में जुट जाएं… दूध खरीदकर पीते हैं…पानी भी खरीदकर लाएं, क्योंकि हम कोई भागीरथ तो हैं नहीं, जो ब्रह्माजी की तपस्या कर गंगा को स्वर्ग से धरती पर ला पाएं और उसके वैग को काबू में करने के लिए शिवजी की जटाओ को खुलवाएं…हमारी तो औकात सरकार को समझाने, रिझाने और मनाने की भी नहीं है कि पाइप लाइन बदल पाए… वो आपदाओं को भुलाने के लिए दो लाख देना ज्यादा आसान मानते हैं और हम दो-दो हजार लेकर उन्हें सत्ता में लाते हैं…फिर फालतू विलाप क्यों मचाते हैं…क्यों उन पर उंगली उठाते हैं… उंगली उठाते वक्त यह भी नहीं देख पाते हैं कि एक अंगुली नेताओं पर उठ रही है तो तीन उंगली तुम पर भी इशारा कर रही हैं और कठघरे में उंगली उठाने वाले को ही खड़ा कर रही हैं…मंत्रीजी की झुंझलाहट से निकला एक शब्द कान हिला गया… लेकिन वो शब्द सच्चाई की यह घंटी नहीं सुना पाया कि समझ नहीं रखोगे… वोट बेचते रहोगे तो इसी तरह पानी की मौत मरते रहोगे…
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