
- न फॉर्म, ना ही तैयारी, सर्वर ठप, एप फेल
उज्जैन। मतदाता सूची की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर जो तस्वीर सामने आई है, वह किसी डिजिटलीकृत अव्यवस्था की मिसाल बन गई है। सर्वर डाउन हैं, एप हैंग हो रहे हैं, फॉर्म नहीं छपे और फील्ड में बीएलओ हाथ मल रहे हैं। इससे 55 जिलों में वह काम, जो चार दिसंबर तक खत्म होना था, अब दिनो-दिन और जटिल होता जा रहा है।
मप्र में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को प्रारंभ हुए 11 दिन हो गए हैं, लेकिन अधूरी तैयारियों के कारण काम अटका रहा है। सर्वर ठप होने से बीएलओ के पास न 2003 की लिस्ट, न अपडेट कॉपी। आम जनता, बीएलओ और भाजपा-कांग्रेस सभी के एजेंट से परेशान है। दस्तावेजों में भिन्नता से भी समस्या बढ रही है। बीएलओ के पास जो 2003 की लिस्ट है और पोर्टल पर जो सूची है उनके मतदाता नंबर में भी अंतर है। उज्जैन उत्तर विधानसभा क्षेत्र का एक ऐसा ही मामला सामने आया है। इसमें बीएलओ की सूची में मतदाता जो नंबर है, वह निर्वाचन कार्यालय के पोर्टल की सूची में उस नंबर पर अन्य मतदाता का नाम है। इस तरह के हजारों मामले है। वेबसाइट के जरिए बीएलओ 2003 की पुरानी वोटर लिस्ट व 2025 की नई लिस्ट से डेटा मिलान करते हैं। वेबसाइट बंद होने से नई लिस्ट देखने की सुविधा व तुलना नहीं रही। जिस डिजिटल टूल पर पूरा एसआईआर टिका है, वही सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है। आयोग ने फील्ड डेटा कलेक्शन के लिए जो बीएलओ एप तैयार किया, उसकी तकनीकी खामियाँ संकट में बदल चुकी हैं। एप का सबसे बड़ा झोल है ब्लड रिलेशन लिंकिंग फीचर। यह सिर्फ ‘पिताÓ और ‘दादाÓ के रिश्ते को मान्य करता है। किसी मतदाता को ‘चाचाÓ, ‘ताऊÓ या ‘भाईÓ से जोडऩा हो तो सिस्टम उसे ‘अमान्यÓ बता देता है। शहरी इलाकों में यह समस्या ज्यादा है क्योंकि किराएदार और फ्लोटिंग पॉप्युलेशन तेजी से बदलती है। भाजपा की निगरानी टीम ने निर्वाचन सदन में सवाल उठाया कि जब उज्जैन और अन्य बडे शहरों में सिस्टम ठीक से नहीं चल रहा तो छोटे और ग्रामीण जिलों में क्या होगा? मतदाता सूची में गलत मैपिंग से आगे डुप्लीकेट या मिसिंग वोटर्स का संकट खड़ा हो सकता है।