
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने यौन उत्पीड़न (POCSO) मामलों में अदालतों द्वारा की जाने वाली टिप्पणियों को लेकर चिंता जताई है और उच्च न्यायालयों (High Courts) तथा निचली अदालतों के लिए दिशानिर्देश बनाने पर विचार शुरू किया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा कि वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 17 मार्च, 2025 के आदेश को रद्द करेगी। उस आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा था कि नाबालिग लड़की के साथ हुए यौन हमले के कुछ कृत्यों को, जैसे नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसके निचले वस्त्र को खींचने का प्रयास करना बलात्कार के प्रयास के लिए अपर्याप्त माना जा सकता है।
शीर्ष अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर कहा कि यौन उत्पीड़न मामलों में असंवेदनशील न्यायिक टिप्पणियों का पीड़ितों, उनके परिवारों और समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) से इस मुद्दे पर व्यापक रिपोर्ट तैयार करने को कहा।
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह दिशा-निर्देश पूरी तरह से अखिल भारतीय स्तर पर लागू होने चाहिए। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि अदालतों द्वारा ऐसे मामलों में उम्र और संवेदनशीलता के अनुसार भाषा का इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों के लिए ऐसे दिशानिर्देशों पर विचार कर रही है, ताकि यौन अपराध मामलों में न्यायिक टिप्पणियां पीड़ित के हित और संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर की जाएँ।
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