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सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन मामले में की ऐतिहासिक पहल, विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा, जाने इसके बारे में

February 12, 2026

नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (Muslim Personal Law) के तहत तलाक-ए-हसन (Talaq-e-Hasan) के एक मामले में अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पति द्वारा तलाक (Divorce) की दो कोशिशों पर रोक लगा दी है और मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया है, ताकि वैवाहिक विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला जा सके। यह आदेश तब आया जब पता चला कि पति ने 2022 में पहली बार तलाक-ए-हसन देने के बाद दूसरी शादी भी कर ली है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमलिया बागची की पीठ के समक्ष महिला बेनजीर हीना की ओर वरिष्ठ वकील रिजवान अहमद और पति यूसुफ नाकी की ओर एमआर शमशाद पेश हुए। दोनों पक्षों ने शरीयत और मुस्लिम पर्सनल लॉ की अलग-अलग व्याख्याएं पेश कीं। बावजूद इसके, पीठ ने दोनों पक्षों को बातचीत के माध्यम से हल निकालने के लिए मनाने में सफलता पाई।

मामला 2022 में शुरू हुआ, जब पति ने तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया अपनाते हुए एक महीने के अंतराल में तीन बार तलाक कहा। बेनजीर हीना ने शीर्ष अदालत में इसकी वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह प्रक्रिया मुस्लिम महिलाओं को असुरक्षित छोड़ देती है क्योंकि इसमें भरण-पोषण का कोई प्रावधान नहीं है। अदालत ने नोट किया कि तलाकनामा उन्हें उनके पति के वकील के माध्यम से दिया गया था। हीना ने बताया कि वे दोबारा शादी नहीं कर सकतीं क्योंकि उनके पास वैध तलाकनामा नहीं है। वहीं, पति के वकील ने दावा किया कि तलाक वैध है, जिसे महिला के वकील ने खारिज कर दिया।


  • स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पीठ ने कहा कि वैवाहिक विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान और तलाक-ए-हसन की वैधता की जांच के लिए मध्यस्थता लेना जरूरी है। अदालत ने मामला पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश कुरियन जोसेफ के पास भेजा, जो 2017 में शायरा बानो मामले में ‘इंस्टेंट ट्रिपल तलाक’ को असंवैधानिक घोषित करने वाली संविधान पीठ का हिस्सा थे।

    इसी दौरान दिल्ली निवासी आसमा ने भी तलाक-ए-हसन की वैधता पर याचिका दायर की, जिसमें उनके पति मोहम्मद अंसार ने नोटिस का जवाब नहीं दिया। अदालत ने करावल नगर के एसएचओ को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई पर अंसार को पेश करें। वकील शमशाद ने यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि आदेश से यह संदेश न जाए कि तलाक-ए-हसन अवैध है, जिस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए है और तलाक-ए-हसन की वैधता पर कोई राय नहीं दी गई है।

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