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भाषा विवाद: तमिलनाडु और केंद्र सरकार आमने-सामने, हिंदी विरोध का आंदोलन सौ साल पुराना

February 07, 2026

नई दिल्ली। स्कूलों में तीन भाषाएं पढ़ाने के मुद्दे पर तमिलनाडु और केंद्र सरकार (Tamil Nadu and Central Government) आमने-सामने हैं। यह त्रिभाषा फार्मूला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का हिस्सा है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने केंद्र सरकार पर राज्य का बजट रोकने का आरोप लगाया है और पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लंबित 2,152 करोड़ रुपये जारी करने की मांग की है। यह फंड केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत शिक्षा के अधिकार अधिनियम के पालन के लिए अपेक्षित था।



  • स्टालिन का रुख:
    स्टालिन ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह कहा कि तमिलनाडु को भारतीय संविधान की शर्तों को मानना होगा और त्रिभाषा नीति लागू करना कानून का हिस्सा है। स्टालिन ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि हिंदी सिर्फ एक मुखौटा भाषा है और असली मंशा संस्कृत थोपने की है। उन्होंने बताया कि हिंदी के कारण उत्तर भारत में कई स्थानीय बोलियां जैसे अवधी और बृज लुप्त हो गई हैं। स्टालिन ने राजस्थान का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां उर्दू हटाकर संस्कृत थोपने की कोशिश की जा रही है।

    हिंदी विरोधी आंदोलन का इतिहास:
    तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन लगभग 100 साल पुराना है। केरल और कर्नाटक के विपरीत, तमिलनाडु में अभी भी दो-भाषा फार्मूला लागू है, जिसमें छात्रों को केवल तमिल और अंग्रेजी पढ़ाई जाती है।

    स्वतंत्रता के बाद से ही शिक्षा की भाषा पर बहस चल रही है। 1948-49 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने सुझाव दिया था कि केंद्र सरकार के प्रशासनिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक कामकाज अंग्रेजी में किए जाएं और प्रदेशों के सरकारी कामकाज क्षेत्रीय भाषाओं में होना चाहिए। आयोग ने यह भी कहा कि अंग्रेजी को तुरंत हटाना व्यावहारिक नहीं है और संघीय कामकाज तब तक अंग्रेजी में होना चाहिए जब तक सभी राज्य बदलाव के लिए तैयार न हों।

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