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1954 का पंचशील समझौता: नेहरू का दृष्टिकोण और चीन के असली मंसूबे, CDS ने खोली बात

February 14, 2026

नई दिल्ली। भारत और चीन (India-China) के रिश्तों को लेकर हाल ही में सीडीएस अनिल चौहान (CDS Anil Chauhan) ने महत्वपूर्ण बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (PM Jawaharlal Nehru) ने चीन के साथ किया गया पंचशील समझौता (Panchsheel Agreement) उत्तरी सीमा पर शांति और स्थिरता (peace and stability) बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।
चौहान के मुताबिक, उस समय भारत और चीन के बीच उत्तरी सीमा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। ब्रिटिश राज के बाद भारत को यह तय करना था कि सीमा कहां तक है। नेहरू ने संभवतः इस अनिश्चितता और क्षेत्रीय चुनौती को देखते हुए पंचशील के पांच सिद्धांतों के माध्यम से मित्रता और सहअस्तित्व का रास्ता चुना।

पंचशील समझौते का आधिकारिक नाम था ‘भारत और चीन के बीच तिब्बत क्षेत्र के साथ व्यापार और आवागमन पर समझौता’। इसके तहत भारत ने तिब्बत को आधिकारिक रूप से चीन का हिस्सा स्वीकार किया। इसके पांच मुख्य सिद्धांत थे:

एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान

पारस्परिक अनाक्रमण न करना

आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना

समानता और पारस्परिक लाभ

शांति पूर्ण सहअस्तित्व

सीडीएस ने बताया कि चीन के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने हाल ही में तिब्बत को अपने नियंत्रण में लिया था। ल्हासा और शिनजियांग तक पहुंचने के बाद चीन चाहता था कि क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे। इस समय भारत भी चीन के साथ मजबूत दोस्ताना संबंध चाहता था और संयुक्त राष्ट्र में चीन की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया।

पंचशील समझौते के बाद भारत ने उत्तरी सीमा पर यह मान लिया कि छह दर्रे—शिपकी ला, माणा, नीति, किंगरी-बिंगरी, लिपुलेख और धर्मा—व्यापार और तीर्थ यात्रा के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन चीन ने इसे केवल व्यापारिक समझौता माना और स्पष्ट कर दिया कि सीमा विवाद या सीमा निर्धारण इसका हिस्सा नहीं है।

इस समझौते की वैधता आठ साल के लिए थी। 3 जून 1962 को समझौते के समाप्त होने के कुछ समय बाद ही चीन ने भारत पर हमला कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि चीन के लिए पंचशील केवल व्यापारिक और स्थिरता बनाए रखने का औजार था, सीमा विवाद को हल करने का नहीं।


  • सीडीएस अनिल चौहान की व्याख्या से यह समझ आता है कि नेहरू ने पंचशील के माध्यम से शांति और मित्रता की कोशिश की, जबकि चीन के रुख ने आगे चलकर भारत-चीन संबंधों में चुनौतियां पैदा कीं। यह ऐतिहासिक समझौता आज भी भारत-चीन संबंधों के अध्ययन में महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जाता है।

     

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