
नई दिल्ली। नक्सलवाद (Naxalism) के पूर्ण सफाए की समयसीमा बेहद करीब है। गृह मंत्री (Home Minister) अमित शाह (Amit Shah) की 31 मार्च, 2026 की डेडलाइन को धरातल पर उतारने के लिए बजट में सुरक्षा-केंद्रित विकास का बड़ा मॉडल पेश किया जा सकता है। नक्सलियों के गढ़ में सुरक्षा बलों की बढ़ती पैठ और पिछले वर्ष 1,300 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के बाद बड़ी चुनौती वहां शांति को स्थायी बनाने की है। बजट में छत्तीसगढ़, झारखंड व ओडिशा जैसे राज्यों में विकास की रफ्तार तेज करने के लिए विशेष आवंटन की उम्मीद है।
रोजगार और स्थानीय परियोजनाओं पर जोर
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सलवाद के खात्मे के बाद बेरोजगारी सबसे बड़ी चुनौती होगी। बजट में स्थानीय युवाओं को घर के पास ही नौकरी के लिए विशेष कौशल विकास कोष का प्रावधान किया जा सकता है।
सरेंडर पॉलिसी
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को आर्थिक मदद के अलावा विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं। बजट में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस की संख्या बढ़ाने पर जोर रहेगा। इन इलाकों में फोर्स की तैनाती को स्थायी सुरक्षा ढांचे में तब्दील करने की योजना है, ताकि नक्सली फिर न पनप सकें।
सड़कों का जाल व डिजिटल क्रांति
नक्सली क्षेत्रों में विकास की पहली शर्त कनेक्टिविटी है। पिछले दशक में 12,000 किमी से अधिक सड़कें बनाई जा चुकी हैं। अब शेष दुर्गम क्षेत्रों को जोड़ने के लिए विशेष बुनियादी ढांचा योजना के तहत बड़ी राशि आवंटित होने के आसार हैं। साथ ही, डिजिटल पहुंच बढ़ाने के लिए 8,500 से अधिक नए 4जी टावरों और बैंकिंग सेवाओं के विस्तार के लिए विशेष फंड सुनिश्चित किया जाएगा। हर 5 किमी के दायरे में डाकघर और बैंकिंग संवाददाताओं की नियुक्ति सरकार की प्राथमिकता है।
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