ग्वालियर। ग्वालियर में एक मार्मिक मामला सामने आया है, जहां 9 साल के एक बच्चे ने कथित गलत इलाज से बिगड़ी अपनी हालत को लेकर खून से पत्र (letter with blood) लिखकर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) से न्याय की गुहार लगाई। बच्चे के पिता ने शहर के एक निजी डॉक्टर पर बिना आवश्यक डिग्री के इलाज करने और दवाओं के ओवरडोज देने का आरोप लगाया है।
एयरपोर्ट पर सौंपा खून से लिखा पत्र
जानकारी के मुताबिक, तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला यशवर्धन राठौर अपने पिता के साथ सिंधिया के शहर आगमन की सूचना पर एयरपोर्ट पहुंचा। वहां उसने अपने खून से लिखा पत्र मंत्री को सौंपते हुए कार्रवाई की मांग की।
बताया गया कि सिंधिया ने पत्र देखने के बाद पिता-पुत्र को उचित जांच और न्याय दिलाने का आश्वासन दिया।
परिजनों के अनुसार, बच्चे के सिर पर उम्र के मुताबिक बाल कम थे, जिसके इलाज के लिए वर्ष 2020 से 2024 के बीच एक त्वचा रोग विशेषज्ञ के क्लिनिक में उपचार कराया गया। परिवार का आरोप है कि इलाज से सुधार होने के बजाय बच्चे के बाल पूरी तरह झड़ गए, आंखों की रोशनी प्रभावित हुई और अन्य शारीरिक समस्याएं भी बढ़ने लगीं।
मेडिकल जांच में सामने आई गंभीर स्थिति
बाद में बच्चे को एक मेडिकल कैंप में दिखाया गया, जहां से उसे एम्स भोपाल भेजा गया। वहां प्रारंभिक जांच के बाद विशेषज्ञों ने उसे आगे उपचार के लिए एम्स नई दिल्ली रेफर कर दिया। परिजनों का कहना है कि उच्चस्तरीय जांच में बच्चे की स्थिति चिंताजनक बताई गई है और कुछ सैंपल विदेश में परीक्षण के लिए भेजे गए हैं।
डॉक्टर की डिग्री पर उठाए सवाल
बच्चे के पिता ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत संबंधित डॉक्टर की शैक्षणिक जानकारी निकलवाने का दावा किया है। उनका आरोप है कि डॉक्टर के पास त्वचा रोग विशेषज्ञ की मान्य डिग्री या डिप्लोमा नहीं है और वे दूसरे के नाम से पंजीकृत क्लिनिक में प्रैक्टिस कर रहे थे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इलाज के दौरान हाई डोज दवाएं, जिनमें स्टेरॉयड भी शामिल थे, दी गईं, जिससे बच्चे की हालत बिगड़ गई।
कई स्तरों पर शिकायत, अब भी कार्रवाई का इंतजार
परिवार का कहना है कि वे स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से कई बार शिकायत कर चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अब केंद्रीय मंत्री को पत्र सौंपने के बाद उन्हें उम्मीद है कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी।
जांच की मांग तेज
मामले ने स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और निजी क्लीनिकों में योग्यता की जांच को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासनिक स्तर पर शिकायत की जांच की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही जा रही है।
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