वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) इस समय अपनी भाषा और कार्यशैली को लेकर विवादों में घिर हुए हैं। कब क्या निर्णय ले लें किसी को पता नहीं ।
हाल ही में गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ अपने शुरुआती दौर में ही विवादों और कूटनीतिक झटकों का सामना कर रहा है। ट्रंप की इस नई पहल का उद्देश्य मूल रूप से गाजा संघर्ष विराम योजना की निगरानी करना था, लेकिन उनकी वैश्विक विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं ने दुनिया की महाशक्तियों को सतर्क कर दिया है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक,दुनिया के कई बड़े देशों ने इस बोर्ड का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर दिया है, क्योंकि वे इसे 80 साल पुराने अंतर्राष्ट्रीय नियम-आधारित आदेश के लिए खतरा मानते हैं।
ब्रिटेन और फ्रांस: ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने संयुक्त राष्ट्र के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। फ्रांस का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
चीन: चीन के राजदूत फू कोंग ने इसे ‘विजेता-सब-ले-जाता है’ वाली मानसिकता बताते हुए कहा कि कोई भी देश अपनी शक्ति के बल पर शर्तें नहीं थोप सकता।
यूरोपीय देश: स्पेन ने इस बोर्ड में शामिल होने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि इसमें फिलिस्तीनी प्राधिकरण को शामिल नहीं किया गया है।
राजनयिक उथल-पुथल और ‘पे-टू-प्ले’ के आरोप
इस बोर्ड के लिए निमंत्रण भेजने के दौरान ही ट्रंप ने नाटो सहयोगी डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकी दी, जिससे कनाडा और डेनमार्क जैसे करीबी सहयोगी भी नाराज हो गए। हालांकि, बाद में ट्रंप ने इस मुद्दे पर यू-टर्न ले लिया।
ह्यूमन राइट्स वॉच के निदेशक लुई चार्बोनो ने इस पहल की कड़ी आलोचना करते हुए इसे पे-टू-प्ले क्लब (पैसे दो और शामिल हो जाओ) करार दिया है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले देशों के बजाय सरकारों को संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय संकट समूह के रिचर्ड गोवन के अनुसार, यदि ट्रंप इस बोर्ड को केवल गाजा तक सीमित रखते, तो शायद अधिक यूरोपीय देश इसमें शामिल होते। लेकिन इसे ट्रंप फैन क्लब में बदलने की कोशिश ने इसे एक कूटनीतिक जोखिम बना दिया है। फिलहाल, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सर्वोच्चता बरकरार दिख रही है और ट्रंप की यह नई वैश्विक व्यवस्था अभी से बैकफायर करती नजर आ रही है।

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