
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court) ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मामले(Important constitutional cases) पर सुनवाई करते हुए यह चिंता जताई(raised concerns) कि अगर राष्ट्रपति या राज्यपाल अनिश्चित काल तक किसी विधेयक को मंजूरी देने से इनकार करते हैं तो क्या न्यायपालिका इस पर शक्तिहीन होकर देखती रहेगी। इस सुनवाई में शीर्ष अदालत ने पूछा कि अगर विधानसभा से पारित बिलों पर वर्षों तक कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो क्या अदालत इस पर कोई समय सीमा तय नहीं कर सकती है?
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा, “जब विधायिका के दोनों सदनों ने विधेयक को मंजूरी दे दी है तो राष्ट्रपति या राज्यपाल को इस पर अनिश्चित काल तक क्यों बैठना चाहिए?” पीठ ने यह भी कहा कि हालांकि वे कोई निश्चित समय सारिणी तय नहीं कर सकते, लेकिन अगर कोई सालों तक विधेयक पर कोई कार्रवाई नहीं करता है तो क्या अदालत बेबस रहेगी?
यह सुनवाई राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा मई में भेजे गए अनुच्छेद 143 के संदर्भ पर आधारित है। इस संदर्भ में यह स्पष्टता मांगी गई है कि क्या अदालतें संवैधानिक अधिकारियों के लिए समय सीमा निर्धारित कर सकती हैं। सुनवाई के दौरान, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, गोवा, छत्तीसगढ़ और हरियाणा सहित कई राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकीलों ने यह तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रपति या राज्यपालों के लिए कोई समय सीमा नहीं थोपनी चाहिए।
शक्ति का दुरुपयोग नहीं माना जा सकता
मध्य प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि ऐसे मामलों को संसद पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यह मानकर चर्चा शुरू नहीं की जा सकती कि राष्ट्रपति या राज्यपालों को दी गई विवेकाधीन शक्तियों का दुरुपयोग होगा।
न्यायिक समीक्षा से बाहर का विषय
महाराष्ट्र के लिए हरीश साल्वे ने कहा कि विधेयक को रोकना राज्यपाल की व्यक्तिगत ‘वीटो’ नहीं है, बल्कि यह एक “उच्च विवेक” का मामला है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे उच्च संवैधानिक कार्यों को न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं किया जा सकता। वहीं, गोवा का प्रतिनिधित्व कर रहे एएसजी विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि संविधान में “अनुमानित सहमति” का कोई प्रावधान नहीं है, जिसे न्यायिक रूप से नहीं बनाया जा सकता है।
आपको बता दें कि राष्ट्रपति का यह संदर्भ अप्रैल में तमिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आया है। उस फैसले में एक दो जजों की पीठ ने पहली बार राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए बिलों पर निर्णय लेने के लिए समय सीमा तय की थी। उस फैसले में अदालत ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए तमिलनाडु के 10 विधेयकों को स्वीकृत मान लिया था। कोर्ट ने माना था कि राज्यपाल की लंबे समय तक निष्क्रियता अवैध थी।
पीठ ने फिलहाल उन पक्षों की दलीलें सुनी हैं जो राष्ट्रपति के संदर्भ का समर्थन कर रहे हैं। बुधवार को, पीठ उन अन्य पक्षों की दलीलें सुनेगी जो इसके खिलाफ हैं।

©2026 Agnibaan , All Rights Reserved