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पति को छोड़कर अलग रहने वाली पत्नी को पिछला भरण-पोषण नहीं मिलेगा, हाईकोर्ट का अहम फैसला

February 03, 2026

तिरुवनंतपुरम। केरल हाईकोर्ट (Kerala High Court) ने एक महत्वपूर्ण पारिवारिक कानून (Family Law) से जुड़े फैसले में कहा है कि जो पत्नी (Wife) बिना किसी उचित कारण के अपने पति (Husband) को छोड़कर अलग रहती है, वह उस अवधि के लिए पिछला भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सतीश निनन और न्यायमूर्ति पी कृष्ण कुमार की खंडपीठ ने की।

अदालत ने पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति को पत्नी को पिछला भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था, जबकि उसी अदालत ने पत्नी द्वारा पति को छोड़े जाने के आधार पर तलाक भी मंजूर किया था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब यह साबित हो जाए कि पत्नी ने बिना किसी वैध या उचित कारण के पति का परित्याग किया है, तो वह उससे भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। अदालत ने अपने फैसले में कहा जब यह निष्कर्ष निकल चुका है कि पत्नी ने पति को छोड़ा है, तो ट्रायल कोर्ट को उसे पिछला भरण-पोषण देने का आदेश नहीं देना चाहिए था।


  • पत्नी की ओर से यह दलील दी गई थी कि तलाक अधिनियम, 1869 में ‘परित्याग’ की परिभाषा में बिना कारण शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने उद्देश्यपूर्ण व्याख्या अपनाते हुए कहा कि ‘परित्याग का अर्थ केवल अलग रहना नहीं है, बल्कि बिना उचित कारण के विवाह को त्यागना ही परित्याग माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि उचित कारण से अलग रहने वाले जीवनसाथी को भी दोषी माना जाए, तो यह संवैधानिक समानता (अनुच्छेद 14) और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के खिलाफ होगा।

    फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच चले विवाद में पति को तलाक देने की अनुमति दी थी और साथ ही पति को पत्नी के 28 सोने के सिक्के या उनकी बाजार कीमत लौटाने का निर्देश दिया था। इसके अलावा, अदालत ने पत्नी को ₹25,500 और नाबालिग बच्चे को ₹8,000 की राशि पिछली अवधि के भरण-पोषण के रूप में देने का भी आदेश पारित किया था।

    वहीं, इस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए केरल हाईकोर्ट ने सोने के गहनों को लौटाने संबंधी फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन पत्नी को पिछला भरण-पोषण देने के निर्देश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि पत्नी ने बिना उचित कारण पति का परित्याग किया था, इसलिए वह अलग रहने की अवधि के लिए भरण-पोषण की हकदार नहीं है।

    मामले के तथ्यों के अनुसार, दंपति की शादी जून 2003 में ईसाई रीति-रिवाजों के तहत हुई थी। शादी के कुछ समय बाद पत्नी गर्भवती होने पर अपने मायके चली गई, जहां उसने बच्चे को जन्म दिया। दिसंबर 2005 में बच्चे के जन्म के बाद भी पति-पत्नी साथ नहीं रह पाए और दोनों अलग-अलग रहने लगे। इसके बाद पति ने पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की, जबकि पत्नी ने सोने के गहनों, विवाह के समय दिए गए पैसों की वापसी और अपने व बच्चे के भरण-पोषण की मांग को लेकर अलग याचिका दाखिल की।

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