
नई दिल्ली. गाजा (Gaza) के लिए नवगठित शांति बोर्ड (“Board of Peace”) में शामिल होने के अमेरिकी निमंत्रण पर भारतीय विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) का बयान आया है। गुरुवार (12 फरवरी) को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रेस वार्ता के दौरान इससे जुड़े एक सवाल पर भारत (India) के रुख को लेकर जवाब दिया। उन्होंने बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘शांति बोर्ड’ में शामिल होने का न्योता मिला है। फिलहाल हम प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अपनी साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में कहा, ‘शांति बोर्ड के संबंध में, हमें अमेरिकी सरकार से ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का निमंत्रण मिला है। हम वर्तमान में इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं और इसकी समीक्षा कर रहे हैं।’
शांति बोर्ड पर विदेश मंत्रालय का बयान
जायसवाल ने अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘हमें अमेरिका की ओर से शांति बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिला है। हम फिलहाल इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं भारत ने पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और संवाद को बढ़ावा देने के प्रयासों का लगातार समर्थन किया है। हमारे प्रधानमंत्री ने इस पहल का स्वागत किया है, जो गाजा सहित इस क्षेत्र में दीर्घकालिक और स्थायी शांति की दिशा में मार्ग प्रशस्त करती है।’ बता दें कि गाजा के पुनर्निर्माण पर चर्चा करने के लिए 19 फरवरी को वाशिंगटन में बोर्ड की पहली बैठक आयोजित होगी।
ट्रंप ने की शांति बोर्ड की स्थापना
बता दें कि पिछले महीने (22 जनवरी) अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने शांति बोर्ड का शुभारंभ किया। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के चार्टर पर पाकिस्तान सहित 14 देशों ने दस्तखत किए थे। जिसका उद्देश्य गाजा पट्टी में स्थायी शांति, पुनर्निर्माण और अस्थायी शासन की निगरानी करना है। हालांकि फिर इसका विस्तार करते हुए कहा गया कि इसे सिर्फ गाजा तक ना सीमित न रहकर वैश्विक संघर्षों से निपटने में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा, जिसकी अध्यक्षता वे खुद करेंगे।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने लगभग 60 देशों को बोर्ड में शामिल होने के लिए निमंत्रण भेजा है। जिस पर अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इस्राइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, यूएई, उज्बेकिस्तान और वियतनाम सहित लगभग 27 देशों ने इस पहल में शामिल होने पर सहमति व्यक्त की है। हालांकि, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और स्पेन सहित कई पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने इसमें भाग न लेने का विकल्प चुना है।
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