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चीन के पैसों से बनेगा ‘मेक इन इंडिया’? मोदी सरकार बदलने जा रही ये बड़ा नियम!

February 16, 2026

नई दिल्ली: भारत और चीन (India and China) के रिश्तों पर जमी बर्फ अब धीरे-धीरे पिघलती नजर आ रही है. सीमा पर तनाव कम होने के साथ ही अब मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर भी एक बड़ा फैसला लेने की तैयारी में है. इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार चीन से आने वाले निवेश (FDI) के नियमों में ढील देने पर विचार कर रही है. जो दरवाजे अप्रैल 2020 में ‘प्रेस नोट 3’ के जरिए सख्ती से बंद कर दिए गए थे, उन्हें अब थोड़ी शर्तों के साथ फिर से खोलने की चर्चा तेज हो गई है. इसका सीधा असर भारत की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान पर पड़ेगा.

रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार इस बात का आकलन कर रही है कि क्या चीन जैसे पड़ोसी देशों से आने वाले छोटे निवेशों को ऑटोमैटिक रूट से मंजूरी दी जा सकती है. यह बदलाव उन भारतीय कंपनियों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होगा जो पैसे और तकनीक के लिए चीनी भागीदारों पर निर्भर हैं.


  • छोटे निवेश को हरी झंडी देने की तैयारी
    इस पूरे मामले की जड़ ‘प्रेस नोट 3’ में छिपी है. अप्रैल 2020 में, जब सीमा पर तनाव अपने चरम पर था, भारत सरकार ने एक नियम बनाया था. इसके तहत भारत की सीमा से सटे देशों (खासकर चीन) से आने वाले किसी भी निवेश के लिए सरकार की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया था. इसका मकसद भारतीय कंपनियों को चीनी अधिग्रहण से बचाना था.

    लेकिन अब सरकार एक ‘डी मिनिमिस’ (de minimis) सीमा तय करने पर विचार कर रही है. इसे ऐसे समझें कि अगर कोई चीनी निवेश एक निश्चित छोटी रकम या हिस्सेदारी तक सीमित है, तो उसे सरकारी मंजूरी के लंबे और जटिल प्रोसेस से गुजरना नहीं पड़ेगा. अधिकारी ने बताया कि वे देख रहे हैं कि क्या निवेश के लिए ‘हां’ या ‘ना’ कहने की प्रक्रिया को तेज और आसान बनाया जा सकता है. हालांकि, सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि प्रेस नोट 3 को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाएगा, बल्कि उसमें कुछ व्यावहारिक ढील दी जाएगी.

    हिस्सेदारी दो, लेकिन कंट्रोल हमारा ही रहेगा
    बाजार की नब्ज को समझने वाली भारतीय कंपनियां पिछले कुछ महीनों से सरकार को लगातार संकेत दे रही हैं. खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की कंपनियों ने सरकार से गुहार लगाई है कि चीनी कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर (JV) की अनुमति दी जाए.

    इन कंपनियों का तर्क बड़ा ही व्यावहारिक है. इनका कहना है कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने के लिए हमें चीनी सप्लाई चेन और उनकी टेक्नोलॉजी की सख्त जरूरत है, जो फिलहाल हमारे पास मौजूद नहीं है. इंडस्ट्री ने एक बीच का रास्ता सुझाया है, चीनी कंपनियों को ज्वाइंट वेंचर में अधिकतम 26% हिस्सेदारी की अनुमति दी जाए. 26% का आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि इससे चीनी कंपनियों को फायदा तो मिलेगा, लेकिन कंपनी का कंट्रोल भारतीय हाथों में ही रहेगा. यह एक तरह का समझौता है, जिससे भारत को तकनीक और पैसा भी मिल जाए और सुरक्षा भी खतरे में न पड़े.

    चीन के पैसे से बनेगा ‘मेक इन इंडिया’?
    जेपी मॉर्गन के मुख्य भारत अर्थशास्त्र और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य साजिद चिनॉय ने हाल ही में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी. उनका मानना है कि चीन से आने वाले सामानों पर सिर्फ टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने से काम नहीं चलेगा. इसके बजाय, हमें चीन के निवेश (FDI) को सावधानीपूर्वक अनुमति देनी चाहिए.

    इस तर्क के पीछे की इकोनॉमिक्स यह है कि अगर चीनी कंपनियां भारत में आकर पैसा लगाएंगी और फैक्ट्रियां खोलेंगी, तो इससे भारत की घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ेगी. हम आयात पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की वैल्यू चेन बना पाएंगे. ‘मेक इन इंडिया’ का असली मकसद भी यही है, भले ही पैसा सरहद पार से आए लेकिन रोजगार और फैक्ट्रियां भारत की जमीन पर होनी चाहिए. चिनॉय का कहना है कि निजी कंपनियां मांग की कमी के कारण निवेश नहीं कर पा रही हैं और ऊपर से सस्ता चीनी माल बाजार में भर रहा है. ऐसे में चीनी निवेश एक बूस्टर का काम कर सकता है.

    क्यों भारत आना चाहती हैं चीनी कंपनियां?
    ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत को ही पैसे की जरूरत है, चीन की अपनी मजबूरियां भी हैं. चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ रही है और अमेरिका-यूरोप जैसे विकसित बाजारों में उनके लिए व्यापार करना मुश्किल होता जा रहा है. ऐसे में भारत उनके लिए दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बड़ा बाजार है.

    चीनी कंपनियां भारत में निवेश को एक ‘ग्रोथ स्ट्रैटेजी’ के रूप में देख रही हैं. वे जानती हैं कि भारत में मैन्युफैक्चरिंग करने से वे न सिर्फ भारतीय बाजार में अपनी पैठ बना सकेंगी, बल्कि दुनिया भर में लगने वाले टैरिफ और जियो-पॉलिटिकल तनाव से भी बच सकेंगी. हालांकि, सरकार सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहती. प्रेस नोट 3 का मुख्य उद्देश्य चीनी कम्युनिस्ट पार्टी या उनकी सेना से जुड़े निवेशों को रोकना था. इसलिए, भले ही छोटे निवेशों (डी मिनिमिस) को छूट मिल जाए, लेकिन बड़े और रणनीतिक निवेशों पर सरकार की पैनी नजर बनी रहेगी. गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय अभी भी हर प्रस्ताव की बारीकी से जांच करेंगे.

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