
नई दिल्ली । 27 फरवरी को रिलीज (Releasing on February 27)होने जा रही फिल्म ‘यादव जी की लव स्टोरी’(Yadav ji’s love story) अभी सिनेमाघरों तक पहुंची भी नहीं है, लेकिन उससे पहले ही विवादों के घेरे में आ गई है। फिल्म की कहानी एक यादव समाज की लड़की और एक मुस्लिम लड़के(Muslim boys) की प्रेम कहानी (love story)पर आधारित बताई जा रही है, जिसे लेकर यादव समाज(Yadav community) के कुछ संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उनका आरोप है कि फिल्म न सिर्फ उनकी जातीय पहचान को गलत संदर्भ में पेश करती है, बल्कि इसे ‘लव जिहाद’ जैसे संवेदनशील मुद्दे से जोड़कर समाज में गलत संदेश देने की कोशिश भी की जा रही है। विरोध कर रहे लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर फिल्म को रिलीज किया गया तो आंदोलन तेज किया जाएगा।
फिल्म के मेकर्स की ओर से अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विवाद ने इसे अचानक सुर्खियों में ला खड़ा किया है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी फिल्म को जाति, समुदाय या सामाजिक पहचान के मुद्दे पर विरोध का सामना करना पड़ा हो। हिंदी और क्षेत्रीय सिनेमा में इससे पहले भी कई फिल्में इसी तरह के विवादों में घिर चुकी हैं।
पद्मावत इसका बड़ा उदाहरण है। फिल्म की घोषणा के साथ ही राजपूत संगठनों और करणी सेना ने आरोप लगाया था कि रानी पद्मावती के चरित्र को गलत तरीके से दिखाया जाएगा और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की जाएगी। विरोध इतना बढ़ा कि फिल्म के सेट पर तोड़फोड़ तक हुई और बाद में मेकर्स को कुछ बदलाव भी करने पड़े। इसी तरह सैराट में एक दलित लड़के और मराठा लड़की की प्रेम कहानी दिखाए जाने पर कुछ मराठा संगठनों ने आपत्ति जताई थी। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की, लेकिन रिलीज के दौरान विरोध प्रदर्शन भी झेलने पड़े।
आर्टिकल 15 भी जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को उठाने के कारण विवादों में रही। कुछ संगठनों ने आरोप लगाया कि फिल्म एक खास समाज की छवि को नकारात्मक रूप में पेश करती है। वहीं जय भीम को लेकर वन्नियार समुदाय के कुछ लोगों ने आपत्ति जताई थी और दावा किया था कि फिल्म में उनके समाज को गलत तरीके से चित्रित किया गया है। मामला इतना बढ़ा कि कानूनी नोटिस और प्रदर्शन तक की नौबत आ गई।
महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित फुले को भी महाराष्ट्र में कुछ ब्राह्मण संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा था। आरोप था कि फिल्म में इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और एक समुदाय विशेष को नकारात्मक रूप में दिखाया गया है। वहीं ‘घूसखोर पंडित’ नामक फिल्म को उसके शीर्षक को लेकर ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी झेलनी पड़ी और मामला अदालत तक पहुंच गया।
इन उदाहरणों से साफ है कि भारतीय सिनेमा में जब भी कहानी जाति, समुदाय या धार्मिक पहचान से जुड़ती है, तो संवेदनशीलता और विवाद साथ-साथ चलते हैं। अब देखना होगा कि ‘यादव जी की लव स्टोरी’ रिलीज तक पहुंच पाती है या विरोध के दबाव में इसे बदलाव या टालने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। फिलहाल इतना तय है कि फिल्म ने रिलीज से पहले ही चर्चा और बहस का माहौल गर्म कर दिया है।

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