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उत्तम नहीं हो सकते सर्वोत्तम…संयम हो तो संत बनो…और लालसा रखो तो संसार से भिड़ो..

February 14, 2026

दौर चला है संत (saint) बनने का…आस्था को लूटने (robbing the faith) और भगवान (God) बनने का… कोई गीता (God) के चार अध्याय पढक़र… अपनी भाषा में गढक़र संत बन जाता है… कोई रामायण के दोहों को छिन्न-भिन्न कर कथाकार हो जाता है… भगवा पहने ऐसे लोगों को हिन्दुत्व का मसीहा समझा जाता है… कोई संत और साधु का अंतर नहीं समझ पाता है… संत सांसारिक होता है और साधु त्यागी… सांसारिक लोगों में वो ही लालसा होती है, जो सामान्य लोगों में होती है… सांसारिक लोगों की वेदनाओं, तृष्णाओं चाहतों से जूझता संत का व्यक्तित्व दोनों चरित्र में जीता है…वो बात त्याग की करता है, लेकिन मोह संसार का रखता है… वो नेताओं से निकटता बनाता है… अमीरों को पास बिठाता है…समृद्धता और संपन्नता में हिस्सेदारी निभाता है…भक्तों की भावनाओं को लूटने और मजमा जुटाने की कला में जो माहिर हो जाता है, वो बड़ा संत कहलाता है… बरसों पहले चंद्रास्वामी नामक संत का अंत लोगों ने देखा… फिर धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की इंदिराजी तक पहुंच को लोगों ने परखा… वही शैली आज भी कायम है… संतों की नेताओं से नजदीकी उन्हें महान बनाती है और महान बन चुके संतों को नेताओं की बिरादरी बुला-बुलाकर भगवान बनाती है… ऐसे में कई कथाकार संत बन जाते हैं और फिर संत भगवान बनकर आस्था लूटने लग जाते हैं… दोष उनका ही नहीं हमारा भी है कि हम भोजन के लालच में भीड़ बनकर ऐसे भगवानों की कथा में शामिल हो जाते हैं… प्लास्टिक के रुद्राक्षों को लूटने के लिए जान की बाजी लगाते हैं… हमारी भीड़ और हमारी थोथी आस्था उनके अहंकार का कारण बन जाती है… उनकी कथाओं की कीमत बढ़ती जाती है… नेताओं से नजदीकी दलाली में बदल जाती है और संत का संयम टूट जाता है… वो संसार की अभिलाषाओं में लिप्त हो जाता है…फिर कोई आसाराम बन जाता है तो कोई राम रहीम तो कोई रामपाल बनकर जेल की हवा खाता है… अपना सम्मान लुटता देख कोई इतना शर्मसार हो जाता हैकि संसार को लडऩे का ज्ञान देने वाला संत खुदकुशी करने पर आमादा हो जाता है…लोगों को मायाजाल से निकालने का दावा करने वाले ऐसे संत खुद ही जाल में फंस जाते हैं… कुछ दिनों से ऐसी ही पीड़ा से गुजर रहे उत्तम स्वामी कितने उत्तम हैं यह तो वक्त बताएगा, लेकिन स्वामियों को उत्तम रखने का दायित्व हम पर भी आएगा… हम संत को भगवान क्यों समझने लगते हैं और कथाकार की आस्था को सीमित क्यों नहीं रखते हैं… हम क्यों नहीं समझते हैं कि वो पैसे लेकर ज्ञान बांटने आते है और दूसरों को मोहमाया से दूर रहने का पाठ पढ़ाते है…हमारी इसी नादानी ने संतों को व्यावसायिक बना डाला… वो नेताओं से चरण वंदना कर अपना कद बढ़ाते हैं और हमें अपने पैरों में झुकाते हैं… फिर हमें ही रौंदकर आगे बढ़ते जाते हैं… संत यदि सांसारिक है तो त्यागी नहीं हो सकता… यदि समाज इस सत्य को को नहीं समझेगा तो संत के टूटते संयम से साधु समाज पर भी आक्षेप लगता रहेगा… हमारी आस्था विचलित होती रहेगी… हमारी गिनती भक्तों में नहीं भीड़ में होती रहेगी…फिर हमें आसाराम भी मिलेंगे और राम रहीम भी… उत्तम स्वामी भी मिलेंगे और भय्यू महाराज भी…

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