
नई दिल्ली. रूस (Russia) से पेट्रोलियम आयात (Import Petroleum) करने वाले देशों (Countries) पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अनुमति देने वाले नए विधेयक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) द्वारा मंजूरी दिए जाने से दुनिया में खलबली मची है. यह कदम सिर्फ भारत और चीन की नींद उड़ाने वाला नहीं है, बल्कि यूरोपीय संघ के लिए भी एक बड़ा ‘अलार्म’ है. अक्सर माना जाता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का निशाना सिर्फ प्रतिद्वंद्वी देश होते हैं, लेकिन यह नया विधेयक एक अलग ही कहानी बयां कर रहा है. भले ही यूरोपीय संघ (EU) ने यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर मॉस्को की कड़ी निंदा की हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अब भी रूसी संसाधनों पर निर्भर है.
यूरोपीय संघ (EU) में 27 सदस्य देश हैं, जिनमें ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, क्रोएशिया, साइप्रस, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, आयरलैंड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्ज़मबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन और स्वीडन शामिल हैं. पहले ब्रिटेन (UK) भी ईयू में शामिल था लेकिन यह 2020 में इससे अलग हो गया था.
ईयू भी खूब खरीद रहा रूसी तेल
एक रिपोर्ट के अनुसार, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. फरवरी 2022 से अब तक रूस ने ईंधन निर्यात से लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर की कमाई की है. रूस के खजाने को भरने में तेल का हिस्सा 68 प्रतिशत रहा है, जबकि बाकी हिस्सा गैस और कोयले से आया है. आयातकों की सूची में चीन 245 अरब डॉलर की खरीद के साथ शीर्ष पर बैठा है, जबकि भारत 168 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर है. यूरोपीय संघ ने 125 अरब डॉलर का रूसी ईंधन खरीदा है. यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि ट्रंप की ‘टैरिफ गन’ की रेंज में यूरोपीय संघ के देश भी आएंगे.
ट्रंप की धमकी का भारत पर असर नहीं
नवंबर में चीन का रूस से तेल आया थोड़ा घटा, वहीं भारत का आयात अक्टूबर के 2.5 अरब यूरो से बढ़कर नवंबर में 2.6 अरब यूरो हो गया. भारत ने हमेशा अपने ‘व्यावसायिक हितों’ और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि रखा है, लेकिन ट्रंप का यह 500% वाला नया समीकरण इस रणनीति की कड़ी परीक्षा लेने वाला है.
दबाव की राजनीति या बातचीत का नया पैंतरा?
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह कड़ा रुख वास्तव में रूस को झुकाने की सोची-समझी बिसात है. वे चाहते हैं कि रूस बातचीत की मेज पर आए और उन शर्तों को माने जो ट्रंप तय करना चाहते हैं. यह विधेयक रूस के आर्थिक रडार पर चलने वाले हर देश को एक संदेश है कि या तो वे अमेरिका के साथ व्यापार करें या फिर रूसी तेल की भारी कीमत चुकाने को तैयार रहें. हालांकि, ऊर्जा नीति विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा जैसे जानकारों का मानना है कि हमें जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए. उनका तर्क है कि विधेयक का पारित होना एक बात है और प्रशासन द्वारा उसे पूरी कड़ाई से लागू करना दूसरी.
भारत की चुनौतियां
रूस फिलहाल भारत के कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. हालांकि, लुकोइल और रोसनेफ्ट जैसी रूसी कंपनियों पर बढ़ते प्रतिबंधों के कारण आने वाले समय में भारत की खरीद में कुछ गिरावट की संभावना है. भारत ने अब तक पश्चिमी दबाव को दरकिनार कर सस्ते रूसी तेल के दम पर अपनी अर्थव्यवस्था को महंगाई से बचाया है, लेकिन यदि ट्रंप ने इस 500% टैरिफ के चाबुक को सच में चला दिया, तो भारत को अपने ऊर्जा विकल्पों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है.
वैश्विक बाजार में अनिश्चितता का दौर
क्या दुनिया वास्तव में रूस से पूरी तरह किनारा कर पाएगी? या ट्रंप का यह विधेयक केवल एक रणनीतिक दबाव है? फिलहाल पूरी दुनिया ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है. लेकिन एक बात तय है कि वैश्विक ऊर्जा की शतरंज पर अब अगली चाल वाशिंगटन की होगी, और उसकी गूंज नई दिल्ली से लेकर बर्लिन तक सुनाई देगी. आने वाले महीने यह तय करेंगे कि दुनिया की अर्थव्यवस्था तेल की चमक से रोशन होगी या टैरिफ की आग में झुलसेगी।
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