
अहमदाबाद: कोर्ट (Court) में घरेलू हिंसा (domestic violence) का केस अकसर आते रहते हैं. इसमें दहेज प्रताड़ना (dowry harassment) से मारपीट तक के मामले होते हैं. कोर्ट इसमें न्याय करते हुए केस के आधार पर फैसला सुनाता है. इसी तरह के घरेलू हिंसा से जुड़ा ऐसा ही एक मामला गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) पहुंचा. इस केस में हाईकोर्ट ने जो फैसला सुनाया वह सुर्खियों में है. इस फैसले ने कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज कर दी है.हाईकोर्ट ने कहा कि पति द्वारा पत्नी को मारा गया एक थप्पड़ अपने आप में ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं माना जा सकता, जब तक कि लगातार हिंसा या उत्पीड़न के ठोस सबूत मौजूद न हों. इस फैसले के बाद घरेलू हिंसा कानूनों की व्याख्या और उनके दायरे को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं.
रिपोर्ट के अनुसार यह मामला लगभग तीन दशक पुराना है लेकिन हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया है. कोर्ट ने न केवल पति की सजा रद्द की बल्कि यह भी कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित करने के लिए स्पष्ट और प्रत्यक्ष कारण होना जरूरी है. कोर्ट ने माना कि केवल एक घटना के आधार पर किसी व्यक्ति को क्रूरता या आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा. फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि घरेलू विवाद और आपराधिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे तय किया जाए.
यह मामला वलसाड जिले का है जहां 1995 में शादी के कुछ ही महीनों बाद महिला ने आत्महत्या कर ली थी. मृतका के पिता ने पति पर आरोप लगाया था कि वह अकसर देर रात घर आता था, पार्टियों में जाता था और उनकी बेटी के साथ मारपीट करता था. शिकायत में यह भी कहा गया कि एक बार पत्नी के मायके में रहने पर पति वहां पहुंचा और उसे थप्पड़ मारा. इसी आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए और 306 के तहत मामला दर्ज किया था.
सेशन कोर्ट ने साल 2003 में पति को दोषी ठहराते हुए क्रूरता के आरोप में एक साल और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में सात साल की सजा सुनाई थी. हालांकि आरोपी ने इस फैसले को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी. जहां कोर्ट ने सबूतों की दोबारा जांच करते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
क्या कहा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी के मायके में बिना सूचना रुके रहने को लेकर पति द्वारा मारा गया एक थप्पड़ क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित करने के लिए लगातार और असहनीय उत्पीड़न के ठोस प्रमाण जरूरी होते हैं, जो इस मामले में प्रस्तुत नहीं किए जा सके.
अदालत ने ‘क्रूरता’ की परिभाषा को कैसे देखा?
अदालत ने कहा कि क्रूरता केवल एक घटना से साबित नहीं होती. इसके लिए लगातार मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न के सबूत आवश्यक होते हैं. यदि हिंसा निरंतर और गंभीर हो तभी इसे कानूनी रूप से क्रूरता माना जा सकता है.
आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप क्यों खारिज हुआ?
कोर्ट ने पाया कि आत्महत्या और पति के व्यवहार के बीच सीधा और निकट संबंध साबित नहीं हुआ. अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि पति के व्यवहार ने महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर किया.
क्या इसका मतलब घरेलू हिंसा को सही ठहराना है?
नहीं. कोर्ट ने घरेलू हिंसा को वैध नहीं माना, बल्कि कहा कि हर मामले का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर होगा. कानून का उद्देश्य वास्तविक उत्पीड़न के मामलों में न्याय देना है, न कि बिना पर्याप्त प्रमाण के सजा देना.
इस फैसले का भविष्य के मामलों पर क्या असर पड़ सकता है?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अदालतों को सबूतों की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देने की दिशा में प्रेरित करेगा. इससे झूठे या कमजोर साक्ष्यों वाले मामलों में न्यायिक जांच और सख्त हो सकती है.
कानूनी बहस हुई तेज
इस फैसले के बाद वैवाहिक कानूनों और धारा 498ए के इस्तेमाल को लेकर बहस फिर तेज हो गई है. कुछ विशेषज्ञ इसे कानून के संतुलित उपयोग की दिशा में कदम बता रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि ऐसे फैसलों की व्याख्या सावधानी से की जानी चाहिए ताकि वास्तविक पीड़ितों के अधिकार प्रभावित न हों. फिलहाल यह निर्णय घरेलू विवादों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है.
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