वाशिंगटन। अमेरिका (US) में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मिडटर्म चुनाव (Midterm elections) से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के बयानों और चुनाव नियमों में बदलाव की कोशिशों ने नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर चुनाव रद्द या स्थगित कर सकते हैं? कानूनी स्थिति स्पष्ट है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अकेले अपने आदेश से संघीय चुनाव रद्द नहीं कर सकते और न ही उनकी तारीख बदल सकते हैं। इसके लिए कानून में बदलाव जरूरी होगा। हालांकि, चुनावी नियमों, मतदाता पंजीकरण और मेल-इन बैलेट को लेकर प्रशासन की कोशिशों ने चुनाव अधिकारियों और मतदान अधिकारों के समर्थकों की चिंता बढ़ा दी है।
अक्टूबर में टाइम मैगजीन को दिए इंटरव्यू में ट्रंप से मिडटर्म चुनाव को लेकर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने की संभावना के बारे में पूछा गया था। उन्होंने इस संभावना को स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किया। इसके बाद चुनाव प्रक्रिया में संघीय सरकार की भूमिका और राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर बहस तेज हो गई है।
इस सवाल का सीधा जवाब है- नहीं, राष्ट्रपति अकेले ऐसा नहीं कर सकते। अमेरिका में संघीय चुनावों की तारीख कानून के तहत निर्धारित होती है। 2026 के आम चुनाव के लिए 3 नवंबर की तारीख बदलने के लिए कांग्रेस को कानून में बदलाव करना होगा। केवल राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेश या राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा से चुनाव की तारीख नहीं बदली जा सकती।
अमेरिकी संविधान के तहत चुनाव कराने में राज्यों की प्रमुख भूमिका है। वहीं, कांग्रेस को संघीय चुनावों के संचालन से जुड़े नियम निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है। राष्ट्रपति मौजूदा संघीय कानूनों को लागू कराने और अपने वैधानिक अधिकारों के दायरे में कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन वे केवल कार्यकारी आदेश के जरिए राज्यों की चुनावी व्यवस्था पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकते।
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों की चिंता चुनाव रद्द होने से ज्यादा इस बात को लेकर है कि चुनाव से ठीक पहले नियमों में बदलाव, जांच और कानूनी विवादों के कारण मतदान या नतीजों के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
ट्रंप लगातार अमेरिकी चुनाव प्रणाली में धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त नियमों की वकालत करते रहे हैं। उनका विशेष जोर मेल-इन बैलेट, मतदाता पहचान और गैर-अमेरिकी नागरिकों को मतदान से रोकने पर रहा है। व्हाइट हाउस का तर्क है कि ऐसे कदम चुनावों की विश्वसनीयता बढ़ाने और जनता का भरोसा बहाल करने के लिए जरूरी हैं।
हालांकि, इन प्रस्तावों का विरोध करने वालों का कहना है कि राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना चुनावी नियमों में व्यापक बदलाव नहीं कर सकते। इस मुद्दे पर कई कानूनी चुनौतियां सामने आई हैं।
सितंबर में एक रैली के दौरान ट्रंप की चुनाव जीतने के लिए हरसंभव प्रयास करने संबंधी टिप्पणी भी चर्चा में रही। उनके राजनीतिक विरोधियों ने इसे चुनावी प्रक्रिया को लेकर उनकी आक्रामक रणनीति के संदर्भ में देखा। ट्रंप 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में व्यापक धोखाधड़ी के आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन जांच में बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के उनके दावों की पुष्टि नहीं हुई थी।
ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी चुनावों की ईमानदारी बनाए रखने के नाम से एक कार्यकारी आदेश जारी किया था। इसमें मेल के जरिए मतदाता पंजीकरण के लिए अमेरिकी नागरिकता का प्रमाण अनिवार्य करने, मतदाता डेटा तक संघीय सरकार की पहुंच बढ़ाने और डाक मतपत्रों से जुड़े नियम सख्त करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे।
आदेश में राज्यों को प्रशासन के निर्देशों का पालन नहीं करने पर संघीय फंडिंग प्रभावित होने की चेतावनी देने संबंधी प्रावधान भी शामिल थे। इन कदमों को लेकर विरोधियों ने अदालतों का रुख किया। उनका तर्क था कि राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह के नए चुनावी नियम लागू करने का अधिकार नहीं है।
अदालतों ने आदेश के कई प्रमुख प्रावधानों पर रोक लगाई या उन्हें निरस्त किया। इसके बाद प्रशासन ने मतदाता पात्रता की संघीय सूची तैयार करने और डाक मतपत्रों के लिए नए नियम लाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए।
प्रस्तावित बदलावों में बैलेट पर नए बारकोड और ट्रैकिंग प्रणाली लागू करने तथा मतपत्र भेजने की प्रक्रिया को राज्य की पात्र मतदाता सूचियों से जोड़ने की योजना शामिल थी। चुनाव अधिकारियों ने चिंता जताई कि मतदान से कुछ समय पहले इतने बड़े बदलाव लागू करना मुश्किल हो सकता है। इन प्रस्तावों को भी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
अमेरिका में चुनावी अधिकारों का बंटवारा संविधान और संघीय कानूनों के तहत किया गया है।
यही वजह है कि राष्ट्रपति की चुनावी शक्तियों को लेकर विवाद केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक सवाल भी है। अदालतों में चुनौती दिए गए कई प्रस्तावों का मूल मुद्दा यही रहा है कि क्या राष्ट्रपति कार्यकारी आदेश के जरिए उन मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जिनके नियम तय करने का अधिकार संविधान और कानून राज्यों या कांग्रेस को देते हैं।
ट्रंप ने मिडटर्म चुनाव से जुड़े सवाल पर राष्ट्रीय आपातकाल की संभावना को स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किया है। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने मात्र से राष्ट्रपति को चुनाव अपने नियंत्रण में लेने या मतदान की तारीख बदलने का अधिकार नहीं मिल जाता।
आपातकालीन शक्तियां भी संविधान और कानून के अधीन होती हैं। यदि प्रशासन इन शक्तियों के आधार पर चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश करता है, तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
फिर भी, ऐसी घोषणा से प्रशासनिक भ्रम और कानूनी विवाद पैदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर उन राज्यों में, जहां चुनावी मुकाबला बेहद करीबी हो, मतगणना या परिणामों के प्रमाणीकरण को लेकर विवाद बढ़ सकते हैं। हालांकि, यह संभावित स्थिति है, न कि इस बात का प्रमाण कि चुनाव रद्द किए जा सकते हैं।
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इन चुनावों के जरिए कांग्रेस के दोनों सदनों की संरचना तय होती है। 3 नवंबर 2026 को होने वाले चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों के लिए मतदान निर्धारित है।
इन चुनावों का परिणाम ट्रंप प्रशासन की नीतियों, विधायी एजेंडे और अगले दो वर्षों में कांग्रेस के साथ उसके संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। यदि विपक्ष को किसी सदन में बहुमत मिलता है, तो प्रशासन के विधायी प्रस्तावों और सरकारी कामकाज की निगरानी को लेकर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
इसी वजह से अमेरिका में इन चुनावों पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि ट्रंप अकेले चुनाव रद्द कर सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि चुनाव से पहले नियमों और प्रक्रियाओं को लेकर जारी कानूनी लड़ाई किस दिशा में जाती है। राष्ट्रपति के पास चुनाव रद्द करने या अपनी मर्जी से तारीख बदलने की असीमित शक्ति नहीं है। इसके बावजूद, संघीय प्रशासन की कार्रवाई, राज्यों के साथ टकराव और अदालतों में चल रहे मामलों का चुनावी माहौल पर असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष यह है कि राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा अपने आप 2026 के मिडटर्म चुनाव को रद्द या स्थगित करने का कानूनी आधार नहीं बनती। अब नजर इस बात पर रहेगी कि ट्रंप प्रशासन चुनावी नियमों को लेकर आगे क्या कदम उठाता है और अदालतें उन कदमों की संवैधानिक वैधता पर क्या फैसला सुनाती हैं।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved