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मंगल के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी लाकर इतिहास रचने की तैयारी में जापान, 20 अक्टूबर को एच3 रॉकेट से रवाना होगा एमएमएक्स मिशन

October 19, 2026

नई दिल्ली । जापान (Japan) अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अभियान शुरू करने की तैयारी कर रहा है। देश की अंतरिक्ष एजेंसी जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (Japan Aerospace Exploration Agency) अपने मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन (Martian Moons Exploration) मिशन को 20 अक्टूबर को लॉन्च करने की योजना बना रही है। इस अभियान के तहत एक मानवरहित अंतरिक्ष यान मंगल (Mars) के चंद्रमा फोबोस (Phobos) तक पहुंचेगा, वहां की सतह से मिट्टी के नमूने एकत्र करेगा और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाएगा। यह मंगल प्रणाली से नमूने लाने वाला अपनी तरह का पहला अभियान बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

इस मिशन को एच3 रॉकेट के जरिए तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से रवाना किया जाएगा। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, रॉकेट भारतीय समयानुसार तड़के 1 बजकर 11 मिनट पर उड़ान भरेगा। अभियान की योजना के मुताबिक, अंतरिक्ष यान को मंगल तक पहुंचने में लगभग एक वर्ष लगेगा। इसके बाद यह करीब तीन वर्षों तक फोबोस की परिक्रमा करेगा और उसकी सतह का अध्ययन करते हुए नमूने एकत्र करेगा। मिशन का लक्ष्य कम से कम 10 ग्राम मिट्टी लेकर वर्ष 2031 में पृथ्वी पर लौटना है।

फोबोस की सतह से नमूने जुटाना इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके लिए मिशन में आईडेफिक्स नाम का एक रोवर भी शामिल किया गया है। इसका नाम फ्रांसीसी कॉमिक श्रृंखला एस्टेरिक्स में मौजूद कुत्ते के नाम पर रखा गया है। यह रोवर फोबोस की सतह का निरीक्षण करेगा और वहां की परिस्थितियों को समझने में मदद करेगा, ताकि अंतरिक्ष यान की सुरक्षित लैंडिंग और नमूने जुटाने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके। फोबोस पर गुरुत्वाकर्षण बेहद कमजोर होने के कारण अंतरिक्ष यान के उतरने वाले पैरों को विकसित करना वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण रहा है।

एमएमएक्स मिशन का प्रमुख उद्देश्य मंगल और उसके दोनों चंद्रमाओं फोबोस तथा डीमोस की उत्पत्ति से जुड़े सवालों के जवाब तलाशना है। वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि इन दोनों चंद्रमाओं का निर्माण किस प्रक्रिया से हुआ। इसके लिए दो प्रमुख परिकल्पनाओं का अध्ययन किया जा रहा है। पहली परिकल्पना विशाल टकराव से संबंधित है, जिसके अनुसार किसी बड़े खगोलीय पिंड के मंगल से टकराने के बाद निकले पदार्थ से उसके चंद्रमाओं का निर्माण हुआ होगा। दूसरी परिकल्पना के मुताबिक, फोबोस और डीमोस वास्तव में क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने अपनी ओर खींचकर अपने आसपास स्थापित कर लिया।

इन दोनों संभावनाओं में से सही निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए चंद्रमाओं की संरचना और उनकी मिट्टी का अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे न केवल मंगल की उत्पत्ति और विकास को समझने में मदद मिल सकती है, बल्कि सौरमंडल के शुरुआती इतिहास से जुड़े सवालों पर भी प्रकाश पड़ सकता है। बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे चट्टानी ग्रहों के निर्माण तथा उन पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियां विकसित होने की प्रक्रिया को समझने में भी इस शोध से उपयोगी जानकारी मिलने की उम्मीद है।

पृथ्वी की ओर वापसी से पहले अंतरिक्ष यान मंगल के दूसरे चंद्रमा डीमोस का भी निरीक्षण करेगा। हालांकि, इस पर उतरने की योजना नहीं है। मिशन के निष्कर्ष भविष्य में मंगल की खोज के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं। वैज्ञानिक फोबोस को संभावित प्राकृतिक अंतरिक्ष स्टेशन के रूप में इस्तेमाल करने की संभावनाओं का अध्ययन करना चाहते हैं। इससे भविष्य में इंसानों को मंगल तक भेजने और वहां से सुरक्षित वापसी की तकनीकी जरूरतों को समझने में सहायता मिल सकती है।


  • इस अभियान में फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका और यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ करीब 20 विश्वविद्यालय और तकनीकी कंपनियां भी सहयोग कर रही हैं। यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग मंगल प्रणाली के अध्ययन को व्यापक बनाने की दिशा में अहम है। इससे पहले जापान का स्मार्ट लैंडर फॉर इन्वेस्टिगेटिंग मून (स्लिम) जनवरी 2024 में पृथ्वी के चंद्रमा पर उतरा था, लेकिन बाद में पलट गया। इसके बावजूद उसने आंकड़े भेजना जारी रखा और चंद्रमा की कई लंबी रातों तक काम करता रहा। अब एमएमएक्स मिशन के जरिए जापान मंगल के चंद्रमाओं से जुड़े रहस्यों को समझने और अंतरिक्ष अनुसंधान में नई उपलब्धि हासिल करने की कोशिश कर रहा है।

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