
नई दिल्ली. संसद (Parliament) के मॉनसून सत्र (Monsoon Session) का अभी सत्रावसान नहीं हुआ है। विशेष सत्र की संभावना अभी भी बची हुई है। केंद्र सरकार (Central government) परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पास कराना चाहती है। इसके लिए जरूरी संख्या बल भले ही फिलहाल सरकार के पास नहीं है लेकिन मोदी सरकार को भरोसा है कि इसे पास कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत को हासिल किया जा सकता है।
लोकसभा की तीन सीटें खाली होने की वजह से वर्तमान में कुल 540 सांसद हैं। अगर सभी सांसद संसद में मौजूद रहते हैं और वोटिंग में हिस्सा लेते हैं संविधान संशोधन के लिए NDA को 360 वोटों की जरूरत होगी। सरकार डीएमके, एनसीपी (एसपी), शिवसेना (UBT), ओवैसी की एआईएमआईएम, बीजेडी और वाईएसआरसीपी के संपर्क में है। इस लिस्ट में विपक्षी गठबंधन का अहम हिस्सा मानी जाने वाली समाजवादी पार्टी भी शामिल है।
संसद में क्या है एनडीए का नंबर गेम?
NDA के पास अभी 320 सांसदों का समर्थन है। इनमें TMC के 20 बागी सांसद, शिवसेना के 6 सांसद और शिरोमणि अकाली दल का एक सांसद शामिल हैं। वीईएसआरसीपी के 4 सांसद भी अब तक सरकार के साथ खड़े रहे हैं। हालांकि, अब तस्वीर कुछ बदलती नजर आ रही है। अगर ये सभी सांसद पक्ष में वोट करते हैं तो NDA के पास 324 वोट हो जाएंगे। राज्यसभा में 244 में से 164 वोटों की जरूरत है जबकि अभी एनडीए को 158 सांसदों का समर्थन मिलता दिख रहा है।
डीएमके ने साफ कर दिया है कि तमिलनाडु चुनावों के बाद कांग्रेस के साथ रहना उसे सहज नहीं लग रहा है। वहीं, इमरान मसूद जैसे नेताओं के हमलों से समाजवादी पार्टी असहज हो रही है। क्या इसका फायदा BJP को मिल सकता है? YSRCP भी अपनी स्थिति पर फिर से विचार कर रही है। जगन मोहन रेड्डी ने हाल ही में कहा है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून का समर्थन करने का उनकी पार्टी का फैसला गलत था।
इस पूरे गुट के पास लोकसभा में 81 और राज्यसभा में 23 सांसद हैं। अगर इसे NDA के मौजूदा आंकड़ों में जोड़ दिया जाए तो दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा आसानी से हासिल किया जा सकता है। लोकसभा में इस बिल के समर्थन में 401 और राज्यसभा में 181 सांसद हो सकते हैं।
डीएमके ने बढ़ा दी एनडीए की चिंता
डीएमके ने हाल ही में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है। पार्टी ने तमिलनाडु विधानसभा में परिसीमन विरोधी बिल के प्रस्ताव का समर्थन किया था और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों का भी पक्ष लिया था। इन सबके बावजूद बीजेपी को उम्मीद है कि सीटों पर 50% की सीमा तय करने से डीएमके मान जाएगी। डीएमके के सूत्रों का कहना है कि जब तक वे यह नहीं देख लेते कि बिल में क्या लिखा है तब तक वे कोई वादा नहीं करेंगे और न ही कोई टिप्पणी करेंगे।
अखिलेश से भी भाजपा को उम्मीदें
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सामने अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। परिसीमन के बाद यूपी से सांसदों की संख्या बढ़ जाएगी। सपा कांग्रेस से नाराज दिख रही है। एनडीए के फ्लोर लीडर वोटिंग के दौरान उनसे वोटिंग से दूर रहने के लिए कह सकते हैं।
कुल मिलाकार देखें तो कई तरह के समीकरण बन और बिगड़ रहे हैं। एनडीए के रणनीतिकारों के लिए अगला हफ्ता बहुत अहम है। अगर 30 अक्टूबर से 4 नवंबर के बीच का समय निकल गया तो सरकार के परिसीमन एजेंडे के लिए चुनौतियां कई गुना बढ़ जाएंगी।
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